बुधवार, 28 नवंबर 2012

= परिचय का अंग =(४/१६०-२)

॥ दादूराम-सत्यराम ॥
*"श्री दादूदयाल वाणी(आत्म-दर्शन)"* 
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज 
*= परिचय का अंग - ४ =* 
*सूक्ष्म सौंज अरचा बंदगी*
*दादू जल पाषाण ज्यों, सेवै सब संसार ।*
*दादू पाणी लूंण ज्यों, कोइ बिरला पूजणहार ॥१६०॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! संसारीजन, जल और पत्थर की भाँति परमेश्वर की पूजा करते हैं अर्थात् क्षण - भंगुर भक्ति, वैराग्य - भाव रखते हैं । किन्तु जैसे नमक जल में घुलकर अभेद हो जाता है, उसी प्रकार कोई बिरले भक्तजन ही परमेश्वर में अभेद(तल्लीन) होकर पूजते हैं ॥१६०॥ 
सलिलं सैन्धवं यद्वत् साम्यं भजति योगतः । 
तथात्म - मनसोरैक्यं समाधिरभिधीयते ॥ 
चली पूतली लूण की, थाह समंद की लेन । 
लीन आप पानी भई, उलट कहै को बैन ॥ 
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*नाम पारिख लक्षण*
*अलख नाम अंतर कहै, सब घट हरि हरि होइ ।*
*दादू पाणी लूण ज्यों, नाम कहीजे सोइ ॥१६१॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! परमेश्वर के नामों को अप्रकट भाव से कहिये, जिसमें शरीर के रोम - रोम से हरि - हरि ध्वनि होती है । जैसे नमक गलकर जल में अभेद हो जाता है, उसी प्रकार अपने अनात्म - अध्यास को भक्ति - रस में गलाकर परमेश्वर से एकरस होइये ॥१६१॥ 
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*लै लक्षण सहज*
*छाड़ै सुरति शरीर को, तेज पुंज में आइ ।*
*दादू अैसैं मिल रहै, ज्यों जल जलहि समाइ ॥१६२॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! जैसे जल का स्रोत सागर में मिलकर अभेद हो जाता है, उसी प्रकार जीव सुरति देहाध्यास को त्यागकर परमेश्वर से अभेद हो जाये, तो नाम स्मरण की सफलता है अर्थात् जीव चैतन्य तो स्रोत रूप है और ईश्वर चैतन्य सागर रूप है ॥१६२॥
(क्रमशः)

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