गुरुवार, 29 नवंबर 2012

= परिचय का अंग =(४/१६६-८)

॥ दादूराम-सत्यराम ॥
*"श्री दादूदयाल वाणी(आत्म-दर्शन)"* 
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज 
*= परिचय का अंग - ४ =*
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*पर आतम सौं आतमा, ज्यों पाणी में लूंण ।*
*दादू तन मन एक रस, तब दूजा कहिये कूंण ॥१६६॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! परमात्मा समष्टि चैतन्य से जब पराभक्ति द्वारा जल में नमक मिले इस प्रकार तन मन के अध्यास को त्यागकर जीवात्मा एकत्वभाव से चिंतन करे तब व्यष्टि जीवभाव नहीं रहता ॥१६६॥ 
"ज्ञेयं सर्वं प्रतीतं च ज्ञानं च मन उच्यते । 
ज्ञानं ज्ञेयं समं नष्टं नान्यः पन्था द्वितीयकः ॥"
*तन मन विलै यों कीजिये, ज्यों पाणी में लूंण ।*
*जीव ब्रह्म एकै भया, तब दूजा कहिये कूंण ॥१६७॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! जैसे नमक जल में विलय हो जाता है, वैसे ही "परआत्म" कहिए, ब्रह्म से जीवात्मा की एकता होने पर तन मन आदिक भी परमेश्वर में लय हो जाते हैं, फिर द्वैतभाव नहीं व्यापता है ॥१६७॥ 
"कर्पूरंअनले यद्वत्, सैन्धवं सलिले यथा । 
तथा सन्धीयमानं च मनस्तत्वे विलीयते ॥"
(हठयोगदीपिका)
*तन मन विलै यों कीजिये, ज्यों घृत लागे घाम ।*
*आतम कमल तहँ बंदगी, जहँ दादू प्रकट राम ॥१६८॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! जैसे घृत को तप्त करने से वह एकरूप हो जाता है, वैसे ही अपने तन मन आदिक को परमेश्वर में विलीन करके हृदय - प्रदेश में अपना स्वस्वरूप चेतन आत्मा को प्रत्यक्ष करो ॥१६८॥
(क्रमशः)

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