शुक्रवार, 30 नवंबर 2012

= परिचय का अंग =(४/१६९-७१)

॥ दादूराम-सत्यराम ॥
*"श्री दादूदयाल वाणी(आत्म-दर्शन)"* 
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज 
*= परिचय का अंग - ४ =*
*नख शिख स्मरण*
*कोमल कमल तहँ पैसि कर, जहाँ न देखै कोइ ।*
*मन थिर सुमिरण कीजिये, तब दादू दर्शन होइ ॥१६९॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! सूक्ष्म हृदय में अन्तर्लीन होकर मन को स्थिर करके स्मरण करने से परमात्मा के व्यापक रूप का प्रत्यक्ष होता है । वह हृदय स्थान कैसा है ? "जहाँ न देखै कोइ" अर्थात् विषयी - पामर मनुष्यों की गम नहीं है व कोई संसार - वासना वहाँ नहीं व्याप्त है ॥१६९॥ 
*नखसिख सब सुमिरण करैं, अैसा कहिये जाप ।*
*अन्तर बिगसै आत्मा, तब दादू प्रगटै आप ॥१७०॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! नख से शिखा पर्यन्त कहिए, सम्पूर्ण शरीर में रोम - रोम से निरन्तर स्मरण होता रहे, तब समझो कि परमेश्वर के स्मरण में एकाग्र सुरति हुई है । इस प्रकार परमेश्वर में एकाग्र होने से परमेश्वर प्रगट होते हैं । हदय में ही परमेश्वर का दर्शन करके जीवात्मा प्रफुल्लित होता है अथवा अन्तर्निष्ठ वृत्ति द्वारा, आत्म - चिंतन का अभ्यास पूर्ण हो जावे, तब सम्पूर्ण शरीर स्मरण करने की अवस्था में आ जाता है । वृत्ति द्वारा आत्म - चिंतन होता रहता है । यही नख से शिखा पर्यन्त कहिए, शरीर का सम्पूर्ण स्मरण कहा जाता है ॥१७०॥ 
वैरागी लख नांव ले, कहै मैं न प्रकट देश । 
तुम प्रकट सब लोक में, गुरु दादू उपदेश ॥ 
प्रसंग - एक रामदास नाम के वैरागी साधु बहुत बड़े - बड़े मणियों की बहुत लम्बी माला रखते थे । वे इस माला को कुएँ के भूंतिये(चाकला) पर लटकाकर "सीताराम - सीताराम" के एक लाख नाम प्रतिदिन जपा करते थे । उन्होंने जब दादूजी का नाम सुना तो वे आमेर दादूजी से मिलने आए । उन्होंने दादूजी के पास कोई "सुमरणी"(माला) वगैरा नहीं देखी, तो उन्होंने आश्चर्यपूर्वक दादूजी से प्रश्न किया - "आप माला बिना राम नाम का जाप कैसे करते हो ? और आपने तो केश - काषायादि वस्त्र व विभूति तिलक आदि कुछ भी भेष धारण नहीं कर रखा है, जबकि हम अपने शरीर पर विभूति व कौपीन तथा सिर पर घटाटोप जटाजूट धारण करने के अलावा "सवामणी" माला बैल पर लादे फिरते हैं और एक लाख नाम रोज जपते हैं, फिर भी हमारी इतनी प्रसिद्धि नहीं हो रही है, जितनी आपकी ?"
उक्त साखी द्वारा सतगुरु ने उपदेश देकर रामदासजी की शंका का समाधान किया, और जाप - विधि समझाई, जिससे सन्तुष्ट होकर महा मालाधारी रामदासजी उनके शिष्य हो गये, जिनकी गणना दादूजी के सौ शिष्यों में की जाती है ।
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*अंतरगत हरि हरि करे, तब मुख की हाजत नांहि ।*
*सहजैं धुनि लागी रहै, दादू मन ही मांहि ॥१७१॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! जब निरन्तर भगवन्नाम का स्मरण करते हुए "सोहं सोहं" एवं "ररंकार" आदिक अंतर्ध्वनि होने लगती है तो फिर जिह्वा के स्मरण की आवश्यकता नहीं रहती । मन ही मन में अखंड ध्वनि होती रहती है ॥१७१॥
(क्रमशः)

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