शुक्रवार, 30 नवंबर 2012

= परिचय का अंग =(४/१७२-४)


॥ दादूराम-सत्यराम ॥
*"श्री दादूदयाल वाणी(आत्म-दर्शन)"* 
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज 
*= परिचय का अंग - ४ =* 
*दादू सहजैं सुमिरण होत है, रोम रोम रमि राम ।*
*चित्त चहूँट्या चित्त सौं, यों लीजे हरि नाम ॥१७२॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! अखण्ड स्मरण भाव होने पर रोम - रोम में राम रम रहा है, इस प्रकार से स्मरण करने से ही जीव, चैतन्य ब्रह्म में लीन हो जाता है अथवा "चित्त" कहिए, व्यष्टि अन्तःकरण, प्रवृत्ति से निवृत होकर समष्टि अन्तःकरण में अभेद हो जाता है ॥१७२॥ 
*दादू सुमिरण सहज का, दीन्हा आप अनंत ।*
*अरस परस उस एक सौं, खेलैं सदा बसंत ॥१७३॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! सहज स्मरण भाव से प्रसन्न होकर स्वयं भगवान् ने अपने अनन्त स्वरूप को प्रगट किया है, जिससे एकरस होकर मुक्तजन असीम सुख को प्राप्त होते हैं ॥१७३॥ 
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*दादू शब्द अनाहद हम सुन्या, नखसिख सकल शरीर ।*
*सब घट हरि हरि होत है, सहजैं ही मन थीर ॥१७४॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! मुक्तजन, नख से शिखा पर्यन्त, अनहद ररंकार शब्द का अनुभव करते हैं और समस्त शरीर में हरि - हरि ध्वनि होती रहती है । मन सहजावस्था को प्राप्त होकर आत्मस्वरूप में निश्चल हो रहा है ॥१७४॥ 
"सर्वचिन्तां परित्यज्य सावधाने हि चेतसा । 
नाद एवानुसन्धेयो योगसाम्राज्यमिच्छता ॥"
- हठयोग दीपिका
"शब्द अनाहद" के लिये साखी सं. १०० की टीका देखें ।
(क्रमशः)

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