॥ दादूराम-सत्यराम ॥
*"श्री दादूदयाल वाणी(आत्म-दर्शन)"*
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी
विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज
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*= परिचय का अंग - ४ =*
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*परिचय अंग*
*चर्म दृष्टि देखै बहुत, आतम दृष्टि एक ।*
*ब्रह्म दृष्टि परचै भया, तब दादू बैठा देख ॥१५७॥*
टीका - हे जिज्ञासुओं ! देहाध्यासी संसारीजनों को माया आवरण द्वारा एक ब्रह्म ही, संसारभाव करके, नानात्व रूप प्रतीत होता है और आत्म - ज्ञानी पुरुष एक आत्मस्वरूप का अनुभव करते हैं । ब्रह्मदृष्टि जिससे स्वस्वरूप आत्मा ब्रह्मरूप प्रतीत होता है, जो ऐसे मुक्तजन हैं, वे अधिष्ठान ब्रह्म में स्थित होकर केवल आत्मा का अनुभव करते हैं ॥१५७॥
लुब्धा धनमयं विश्वं कामुकाः कामिनीययम् ।
नारायणमयं धीराः पश्यन्ति ज्ञानचक्षुषा ॥
देह दृष्टि देखत फिरै, बिसरया सिरजनहार ।
"जैमल" कोरा चाम का, सौदा करे चमार ॥
चर्म दृष्टि सब जगत है, आत्म दृष्टि दास ।
ब्रह्म दृष्टि जीवन मुक्त, भई वासना नास ॥
दृष्टान्त - अष्टावक्रजी जब माता के गर्भ में थे, उस समय इनके पिताश्री इनकी माताजी को श्रुति - पाठ सुनाया करते थे । एक दिन श्रुति वाचन के समय इनके श्रीमुख से वेद - मन्त्र का अशुद्ध उच्चारण हो गया, तो गर्भस्य शिशु अष्टावक्र ने इन्हें टोककर मातुश्री के मुख से कहलवाया कि पिताश्री ! आप अशुद्ध उच्चारण करके महापापदोष के भागी बन गए हैं, अतःआप शुद्ध वाचन किया करें । ऐसा सुनते ही इनके पिताश्री क्रोध से आग बबूला हो गये और यह कहते हुए कि अभी तो यह गर्भस्थ होते हुए ही छोटे मुँह बड़ी बात कर रहा है तो जन्मने के बाद पता नहीं कितना बड़ा बड़बोला बनेगा, इसकी माता के पेट पर लातें मारने लगे, इससे इनके शरीर में आठ गाँठें पड़ गईं और ये अष्टावक्र कहलाये ।
एक बार राजा जनक की राजसभा में बड़े - बड़े ज्ञानी, विज्ञानी व महर्षिगण आदि बैठे थे । उस समय महामुनि अष्टावक्र जी पधारे । उनके आठ - आठ अंग टेढ़े - मेढ़े देखकर लोग हँसने लगे । अष्टावक्रजी लोगों की हँसी पर हँसने लगे । जनक राजा ने पूछा - मुनिदेव ! हम तो आपके विचित्र अंगों को देखकर हँस रहे हैं, किन्तु आप किस बात पर हँस रहे हैं ? अष्टावक्रजी बोले - राजन् ! मैं तो मानता था कि आपकी इस सभा में सभी ज्ञानी विराजते हैं, किन्तु मैं तो देख रहा हूँ कि यहाँ तो चमारों की भीड़ है, जो देह की आकृति, चर्म व अस्थियों को देख रहे हैं, आत्मा को कोई नहीं । लोग त्वचा की तो मीमांसा करते हैं, किन्तु इस देह के सौन्दर्य का कारण भूत जो है, उस आत्मा की मीमांसा कोई नहीं करता है । तुम सब मेरी आकृति को देखकर हँस रहे हो, किन्तु मनुष्य की आकृति को नहीं, कृति को देखना है । भगवान् भी कृति को ही देखते हैं । आकृति तो पूर्वजन्म के प्रारब्ध से प्राप्त होती है । अतः आप मेरी कृति का मूल्यांकन करो । मूल्य आकार की अपेक्षा मूलभूत तत्व का अधिक है । मूल्य सुवर्ण का है, आभूषण विशेष के आकार का नहीं ।
दृष्टान्त - एक महात्मा के पास दो तोले सुवर्ण के गणपति और ग्यारह तोला सुवर्ण का एक चूहा था । महात्मा वृद्ध हुए तो उन्होंने सोचा कि मेरे बाद मेरे शिष्य मूर्तियों को लेकर झगड़ा करेंगे, अतः इन्हें बेचकर मैं भगवान के भोग लगा दूँ । सुनार ने गणपति की मूर्ति से चूहे का दाम अधिक लगाया । महात्मा बोले - आश्चर्य हैं, गणपति जो देवरूप है उनकी कीमत कम और जो चूहा जन्तु है, उसकी कीमत अधिक ? सुनार बोला - महात्मन् ! कीमत तो मैं सोने की दे रहा हूँ, मेरी दृष्टि में कोई देव या जन्तु नहीं, कोई भेद - दृष्टि नहीं । ज्ञानी सभी को अभेद भाव से देखते हैं । अनेक में एक का अनुभव करना ही तो ज्ञान है । ब्रह्माकार दृष्टि और वृत्ति प्राप्त होने पर आत्मा में परमात्मा का साक्षात्कार होता है ।
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*ये ही नैनां देह के, ये ही आत्म होइ ।*
*ये ही नैनां ब्रह्म के, दादू पलटे दोइ ॥१५८॥*
टीका - हे जिज्ञासुओं ! संसारीजनों के जो दो नेत्र हैं, ये ही तो स्थूल शरीर के देखने वाले दृष्टि रूप नेत्र हैं और इन ही दोनों नेत्रों को जब सतगुरु ने "पलटे" कहिए, आत्मपरायण किये तो आत्मस्वरूप का अनुभव करके अधिष्ठान चेतन में लीन हो रहे हैं ॥१५८॥
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*घट परचै सब घट लखै, प्राण परचै प्राण ।*
*ब्रह्म परचै पाइये, दादू है हैरान ॥१५९॥*
टीका - हे जिज्ञासुओं ! जिस साधक को घट - परिचय धारणा द्वारा पंचभूत परिचय सम्यक् हो जाता है, वह अपने शरीर के सुख - दुःखादिकों की तरह अन्य शरीरों के सुख - दुःख जानने लगता है और जिसको प्राण - सिद्धि हो जाती है, वह अपनी भूख - प्यास आदिक की तरह अन्य शरीरों की भूख - प्यास भी जानने लगता है और जिसको "ब्रह्म परचै" कहिए, आत्मा साक्षात्कार हो जाता है, वह औरों को भी आत्मा परिचय कराने में समर्थ हो जाता है । वह पुरुष तीनों स्थितियों में आश्चर्यकारक है ॥१५९॥
"घट परचै सब घट लखै" पर दृष्टान्त -
बणियों भयो दीवान, जोधाना के नृपति को ।
सुख दुख कियो प्रवाण, शीश पोटली ढोइ के ॥
दृष्टान्त - जोधपुर के राजा का दीवान मृत्यु को प्राप्त हो गया था । दूसरा दीवान बनाने के लिए विचार किया कि अमुक दरवाजे के ऊपर प्रातःकाल जो भी आ जाएगा, उसी को दीवान बना देंगे । उस रोज एक बनिये का लड़का किसी गांव से बोझा डालकर आया, रात को दरवाजे के बाहर पड़ा रहा । सवेरे दरवाजा खोला तो वह मिला । उसी को राजा के पास ले गए । राजा के हुकम से दीवान का पद उसे दे दिया । उसने पहले की पोशाक, फटी हुई जूती, फटा हुआ कमीज, फटी हुई धोती, फटी हुई पगड़ी, एक बक्से में डालकर अपने कमरे में रख लिया । जब कचहरी में जाता तो खोलकर पहले उस पोशाक का दर्शन कर लेता । अपना जीवन भी पहले वाला याद करता । फिर दीवान की कुर्सी पर बैठ कर धर्मराज जैसे फैसले करता, क्योंकि सुख - दुःख अपने ऊपर पहले अनुभव कर चुका था । "प्राण परचै प्राण" पर दृष्टान्त -
साधु जी के देखतां, दई भैंस के चोट ।
सबन दिखाई देउ मत, दियो बारनो ओट ॥
दृष्टान्त - ब्रह्मऋषि दादूदयाल महाराज के शिष्य साधुराम जी मांडोठी गांव के तालाब पर निवास करते थे । एक जाटराम उनकी सेवा करता । एक रोज आपस में भैंस लड़ने लगीं । जाट राम के छोटे भाई ने एक भैंस की पीठ पर दो चार डंडे मारे । महात्मा साधुराम जी देखकर जमीन पर लोट - पोट हो गए । कुछ देर में जाट राम रोटी लेकर आया । देखा, किसी ने गुरुजी की पीठ पर डंडे मारे हैं । पूछा - "गुरु जी ! किसने आपके डंडे मारे ? आपकी पीठ पर निशान हो रहे हैं ।" साधुराम जी बोले - "तुम्हीं सेवा करो, तुम्हीं डंडे मार लो ।" जाट घबरा गया । महाराज ने पूर्वोक्त भैंस का सब वृत्तान्त सुनाया, "वह मेरी ही तो आत्मा है ।" जाट ने गांव में पंचायत करके उस रास्ते को ही बन्द करा दिया, जिस रास्ते से पशु तालाब पर आते थे । दूसरी तरफ रास्ता बना दिया । न महात्मा देखेंगे और न इनको दुःख होगा । साधुरामजी आत्म - परिचय महापुरुष थे ।
संत चले मग जात हो, परिचय ब्रह्मस्वरूप ।
राक्षस काट्यो पीठ में, ब्रह्म कियो तद् रूप ॥
दृष्टान्त - एक ब्रह्मनिष्ठ महात्मा जंगल के मार्ग से जा रहे थे । राक्षस ने देखा - वह मेरा भोजन है, जो जा रहा है । वह पीछे से दौड़ा और महात्मा की पीठ में आकर ज्यों ही बटका भरा, त्यों ही महात्मा ने पीछे देखा कि राक्षस है । महात्मा बोले - "त्वम् ब्रह्म ।" यह सुनते ही राक्षस को ज्ञान हो गया । राक्षस बोला - "अहं ब्रह्म ।" इस ज्ञान को पाकर राक्षस शरीर से मुक्त हो गया । ब्रह्म - परिचय महापुरुष की शक्ति देखी ।
(क्रमशः)

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