॥ दादूराम-सत्यराम ॥
*"श्री दादूदयाल वाणी(आत्म-दर्शन)"*
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज
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*= परिचय का अंग - ४ =*
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*हुण दिल लग्गा हिकसां, मे कूं येहा ताति ।*
*दादू कम्म खुदाय दे, बैठा डीहै राति ॥१७५॥*
टीका - हे जिज्ञासुओं ! "हुण" कहिए, अब इस समय हमारा दिल एक सजातीय - विजातीय स्वगत भेद रहित परमेश्वर से लगा है । हे प्यारे ! हमको एक, आपकी ही चाहना लगी है । हे हमारे खुदा परमेश्वर ! आप अपना स्मरणरूपी कार्य हमको देओ, ताकि रात दिन उसी को करते रहें ॥१७५॥
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*दादू माला सब आकार की, कोई साधु सुमिरै राम ।*
*करणी कर तैं क्या किया, ऐसा तेरा नाम ॥१७६॥*
टीका - हे जिज्ञासुओं ! समस्त शरीर के रोम - रोम को मणियां रूप करके कोई बिरला साधु ही परमेश्वर का स्मरण करता है । पूर्ण भक्तों के रोम - रोम से अंतर्ध्वनि होने लगती है । "करणीकर" कहिए हे कर्तार क्या किया ? जो संतजन इस प्रकार निरंतर तेरे नाम - रस का पान करते हुए भी तृप्त नहीं होते हैं ? अथवा हे कर्तार ! तूने ऐसा क्या माया वैचित्य रचा है, जिससे साधुजन ही आपकी नाम महिमा को जानते हैं और संसारीजन नहीं जानते अर्थात् सब ब्रह्मांड को एक माला मानो, घट - पट आदिक आकार को मनियां समझो और परमेश्वर रूपी धागा है । हे सृष्टि रचयिता ! यह अद्भुत माया प्रपंच क्या रचा है आपने ? इस प्रकार का चिंतन रूप स्मरण कोई संत ही करता है ॥१७६॥
माया घट मणियें सबै, सुमिरे सांई साध ।
रज्जब तुछ तसबी रही, माला मिली अगाध ॥
पंच पचीसों त्रिगुण मन, ये मनियें जीव हेर ।
रज्जब हित के हाथ सौं, आठों पहर सुफेर ॥
अथवा "माला सब आकार की" । हे कर्तार परमेश्वर ! चिन्तामणि रूप आपके नाम का निष्काम स्मरण छोड़कर संसारीजन "आकार की" कहिए, स्थूल शरीर के लिए, "आकार की" कहिए स्त्री पुत्र आदि के लिए, "आकार की" कहिए देवी देवताओं की सिद्धि के लिए, "आकार की" कहिए भूत प्रेत सिद्धि के लिए, "आकार की" कहिए स्वर्ग बैकुण्ठ आदि के लिए, इत्यादि वासना लेकर माला फेरते हैं, परन्तु कोई आपका अनन्य भक्त ही आपका निष्काम भाव से स्मरण करता है ।
दोहा -
जीया पोता फटिक मणि, सूत काठादि माल ।
जैनी जवन रु वैष्णूं, केते जपैं गोपाल ॥
कवित्त
एक माला काष्ठ की, दूजी रुद्राक्ष की,
तीजी माला सूत ग्रंथि, चौथी वनमाला है ।
पांचवीं फटिक - मणि, जीया पोता छठी सुनी,
सातवीं कपूर मोती, आठवीं रसाला है ॥
वैष्णौं तुरक जैन, जगत जपत जाप,
इनके फिराये जम करत न टाला है ।
स्वासों स्वास सोऽहं जाप, कहत "बालकराम",
माला सो ही आला जाके साच सील चाला है ॥
एक नृप माला फेरतां, हाँसिल लेतो नांहि ।
नृप दुख औषध काल जो, मांगत सबै नसांहि ॥
दृष्टान्त - एक राजा के राज्य में जब तहसीलदार जमीन के मुआवजे की उगाही करने लगा, तो गांव का एक वृद्ध गरीब ब्राह्मण बोला - मेरे पास मुआवजा देने को है नहीं । मैं राजा साहब के नाम की माला फेर दिया करूँगा । तहसीलदार ने राजा से कहा - हुजूर ! एक ब्राह्मण आपके नाम की माला फेरता है, उसके पास जमीन का मुआवजा देने को कुछ है नहीं । राजा बोले - ठीक है, और अब हमने यह नेम ले लिया कि जो हमारे नाम की माला फेरेगा, उससे जमीन का मुआवजा नहीं लेवेंगे । जब कास्तकार लोगों ने यह सुना, तो गांव - गांव में यही सबने कहना शुरू किया कि हम राजा जी के नाम की माला फेरते हैं । सब लोग माला लिए नजर आते । मंत्री ने विचार किया कि सारा देश ही माला फेरने लग गया । राज का काम कैसे चलेगा ? तब राजा से मंत्री बोले - अन्नदाता ! यह जो आपका नियम है, इसका तो दुनियां नाजायज फायदा उठाने लग गई । आप कहें तो हम लोग परीक्षा कर लें, माला फेरने वालों की कि आपके लिए कितने लोग माला फेरते हैं ? राजा ने कहा - हाँ, ठीक है, परीक्षा कर लो । जो हमारे लिए माला फेरता है, उससे मुआवजा मत लेना । तब मंत्री ने हुक्म दिया और गांव - गांव में कटोरा और चाकू लेकर राजपुरुष जाने लगे और कास्तकारों को बोलने लगे कि भाई, राजा जी के भारी दुःख है । डाक्टर ने बतलाया है कि जो राजा जी के लिए माला फेरता है, उसका कलेजा लाओ । उसके कलेजे की राजा जी को पट्टी बांधेंगे तब राजा जी का रोग निवृत्त होगा । सो आप अपना कलेजा देओ । यह सुनते ही सब कांपने लगे और बोले कि महाराज ! हम तो राजा जी की माला नहीं फेरते, अपने घरकों के लिए माला फेरते हैं । किसी ने कहा, मैं अपने शरीर के लिए माला फेरता हूँ । किसी ने कहा, मैं स्वर्ग के लिए फेरता हूँ । किसी ने कहा - मैं जमीन जायदाद के लिए फेरता हूँ । मैं अपने लड़के के लिये फेरता हूँ मैं धन के लिए फेरता हूँ । प्रायः सभी काश्तकारों ने इसी प्रकार कहा, उन्हें पुलिस ने पकड़ - पकड़ कर कारागृह में बन्द करना शुरू किया । जब उसी ब्राह्मण के पास आए और कलेजा मांगा, तो वह बोला कि मैं आप ही राजा जी के पास चलता हूँ, क्योंकि वे पालन करने वाले हमारे स्वामी हैं । यह तन - मन सब उनके अर्पण है । पहले मैं इस शरीर में से कई जगह का मांस काट कर दूं और अन्नदाता को उसकी पट्टी बाधें, जब नहीं ठीक होंगे, तब यह कलेजा उसी जगह निकाल कर दे दूँगा । उस ब्राह्मण को राजा के सामने लाए और बोले कि अन्नदाता ! यह एक ही सारे देश में आपके नाम की माला फेरता है । बाकी तो सब लोभ से अपने कुटुम्ब की माला फेरते हैं, आपके नाम की माला कोई नहीं फेरता है । राजा ने हुक्म दिया कि सब काश्तकारों से बकाया मुआवजा जुर्माने सहित लिया जावे । उसी प्रकार सबसे वसूल कर लिया गया । ब्राह्मण को माफ कर दिया । सभी आकार की माला फेरते थे । कोई बिरले भक्त ही राम की माला फेरते हैं ।
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*सब घट मुख रसना करै, रटै राम का नाम ।*
*दादू पीवै रामरस, अगम अगोचर ठाम ॥१७७॥*
टीका - सम्पूर्ण शरीर के रोम - कूपों को मुख और सम्पूर्ण रोमों को जिह्वा बनाकर राम - नाम का जाप करें और उस जप से प्राप्त होने वाले आनन्द - रस का पान करें तो मन से परे इन्द्रियातीत ब्रह्म - धाम में अवश्य पहुँच सकता है अर्थात् परब्रह्म में लीन हो जाता है ॥१७७॥
(क्रमशः)

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