॥ दादूराम-सत्यराम ॥
"श्री दादूदयाल वाणी(आत्म-दर्शन)"
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज
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*= परिचय का अंग - ४ =*
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*पतिव्रत*
*दादू देख्या एक मन, सो मन सब ही मांहि ।*
*तिहि मन सौं मन मानिया, दूजा भावै नांहि ॥१९५॥*
टीका - ब्रह्मऋषि दादूदयाल महाराज कह रहे हैं कि हे जिज्ञासुओं ! हम मुक्तजनों ने एक ऐसे मन का अनुभव किया है, जो समष्टि चेतन रूप मन सब ही में व्यापक है । उसी मन में हमारा व्यष्टि मन लयलीन हो रहा है । अब हमको द्वैतभाव नहीं भासता है ॥१९५॥
चितवन लोचन चहुँ दिशा, फिर चितवत पिव पांहि ।
ज्यूं जल बरसत बादरी, सिमट पनाले मांहि ॥
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*पुरुष प्रकाशी*
*दादू जिहिं घट दीपक राम का, तिहिं घट तिमिर न होइ ।*
*उस उजियारे ज्योति के, सब जग देखै सोइ ॥१९६॥*
टीका - हे जिज्ञासुओं ! जिस संत के हृदय में दीपक की भाँति ब्रह्म प्रकाश हो रहा है, उसके हृदय में तिमिर रूप अज्ञान नहीं रहता है । उस ज्ञान रूपी ज्योति के प्रकाश में मुक्तजन सब जगत को ब्रह्म - स्वरूप ही देखते हैं एवं ऐसा महापुरुष सम्पूर्ण जगत को ब्रह्म ज्ञान ज्योति से आलोकित करता दिखाई देता है ॥१९६॥
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*पतिव्रत*
*दादू दिल अरवाह का, सो अपणा ईमान ।*
*सोई साबित राखिये, जहँ देखै रहमान ॥१९७॥*
टीका - हे जिज्ञासुओं ! जीवात्मा का पवित्र मन ही "ईमान" कहिए कल्याण करने वाला है । अपने मन को एक परमेश्वर में ही सावधान संलग्न रखिये तो अपने हृदय में ही प्रभु का प्रत्यक्ष होगा ॥१९७॥
(क्रमशः)

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