॥ दादूराम-सत्यराम ॥
*"श्री दादूदयाल वाणी(आत्म-दर्शन)"*
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज
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*= परिचय का अंग - ४ =*
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*साध महिमा*
*मीरां कीया महर सौं, परदे थैं लापर्द ।*
*राखि लिया दीदार में, दादू भूला दर्द ॥१९३॥*
टीका - हे जिज्ञासुओं ! "मीरां" कहिए हमारा स्वामी परमात्मा तथा सतगुरु अपने अनुग्रह से जिज्ञासुओं को माया आवरण, अविद्यारूप पड़दे से मुक्त करके, स्वस्वरूप आत्मा का अनुभव कराते हैं । फिर वह परमेश्वर दर्शनों में एकरूप होकर मुक्तजन जन्म - मरण आदिक सांसारिक दुःखों से छूट जाते हैं ॥१९३॥
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*दादू नैन बिन देखबा, अंग बिन पेखबा,*
*रसन बिन बोलबा ब्रह्म सेती ।*
*श्रवण बिन सुनबा, चरण बिन चालबा,*
*चित्त बिन चिन्तबा, सहज एती ॥१९४॥*
टीका - हे जिज्ञासुओं ! निराकार ब्रह्म व्यावहारिक अंगों से तो शून्य है, इसलिए उसका इन बाह्य नेत्रों बिना, ज्ञान नेत्रों से ही प्रत्यक्ष होता है और बिना त्वचा इन्द्रियों के ही लय वृत्ति द्वारा "पेखबा" कहिए स्पर्श, ओत - प्रोत भाव होता है । बिना जिह्वा के ही मनन द्वारा सम्पूर्ण माया - प्रपंच में ब्रह्म का ही प्रतिबिम्ब देखता है । इस प्रकार मानो ब्रह्म से ही वार्तालाप हो रहा है । बाहरी श्रोत्र बिना अन्दर सुरति द्वारा ब्रह्म की अनहद ध्वनि को सुनते हैं और व्यावहारिक पैरों के बिना ही, परमेश्वर की चर्चा रूप चलन क्रिया हो रही है । इसी रीति से बिना चित्त के ही ब्रह्म में अभेद होना मानो, ब्रह्मचिंतन हो रहा है । ये सब लक्षण ब्रह्मनिष्ठ मुक्तजनों में सहज ही होते हैं ॥१९४॥
चौ. -
बिन पद चलै सुनै बिन काना ।
कर बिन कर्म करै विधि नाना ॥
आनन रहित सकल रसभोगी ।
बिन वाणी वक्ता बड़ योगी ॥
(क्रमशः)

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