गुरुवार, 6 दिसंबर 2012

= परिचय का अंग =(४/१९८-२००)

॥ दादूराम-सत्यराम ॥
*"श्री दादूदयाल वाणी(आत्म-दर्शन)"* 
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी 
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज 
*= परिचय का अंग - ४ =* 
*अल्लह आप ईमान है, दादू के दिल मांहि ।*
*सोई साबित राखिये, दूजा कोई नांहि ॥१९८॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! अपने पवित्र मन में ईमान कहिए, ईश्वर का जो निश्चय है, वही मानो साक्षात् परमेश्वर है । ऐसे अपने विश्वास को ही एक रस रखिये, क्योंकि प्रभु प्राप्ति का यही एक सच्चा मार्ग है ॥१९८॥ 
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*प्राण पवन ज्यों पतला, काया करै कमाइ ।*
*दादू सब संसार में, क्योंहि गह्या न जाइ ॥१९९॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! "कमाइ" कहिए, ब्रह्मयोग के द्वारा प्राण जीवात्मा अपने स्थूल शरीर को पवन की भाँति "पतला" कहिए, सूक्ष्म बनाकर ब्रह्म में अद्वैत रूप हो जावे तो फिर संसार - वासना में उसकी आसक्ति नहीं रहती है और व्यवहार - काल में भी किसी के द्वारा पकड़ा नहीं जाता है ॥१९९॥ 
गुरु दादू को शाहपुरै, ले गये साकत लोग ।
परचा की मन में रही, चलत दिखायो योग ॥ 
दृष्टान्त - शाहपुरा में त्रिलोकशाह नाम का वैश्य रहता था । ब्रह्मऋषि दादूदयाल जी की जब महिमा सुनी, तब उसने विचार किया कि हमारे गांव में भी महाराज को ल्यावें । तब आप कई भक्तों को साथ लेकर महाराज के पास पहुँचे, नमस्कार किया और शाहपुरा पधारने का निमन्त्रण दिया । महाराज ने स्वीकार कर लिया । जब शाहपुरे गांव के बाहर महाराज पहुँचे, तब त्रिलोकशाह बहुत से गाँववासियों को साथ लेकर महाराज की अगवानी को गए । बड़े धूम - धाम से महाराज को अपने घर लाकर ठहराया । सभी नगरवासियों ने उनके अमृत - मय उपदेशों का श्रवण किया । महाराज का ज्ञान सुनकर त्रिलोक शाह मन में बहुत हर्ष को प्रापत हुआ, परन्तु मन में यह विचार किया कि दादूदयाल जी के बारे में मैंने सुना था, ये परिचै सिद्ध हैं । परचा तो मैंने इनका कोई देखा नहीं । जब ब्रह्मऋषि वहाँ से प्रस्थान करने लगे, तो त्रिलोकशाह की पुत्री ने महाराज को एक थान मलमल का भेंट करके नमस्कार किया । जब महाराज गांववासियों के साथ नगर के बाहर आये, तो त्रिलोकशाह की तरफ महाराज ने देखा, उसके मन की बात जान गए और बोले - रामजी, हमारे जो बाई ने कपड़ा भेंट किया था, वह वहीं रह गया । आप वहाँ जाकर ले आओ । त्रिलोकशाह घर आए तो देखा कि महाराज गद्दी पर बैठे हैं और उपदेश कर रहे हैं । तब खड़ा होकर विचार किया कि महाराज किसी ओर तरफ से तो आकर नहीं बैठ गए हैं । तब दौड़ कर वहाँ गया, जहाँ महाराज खड़े थे । महाराज बोले - रामजी, खाली कैसे आ गए ? तो फिर वापिस दौड़ा घर आया । महाराज के रूप में बैठे भगवान् कहने लगे, "ब्रह्मऋषि का कपड़ा ले, क्या दिखाई नहीं पड़ा ?" वहाँ आया, जहाँ महाराज खड़े थे । महाराज बोले - कपड़े को खोल कर, मेरी कमर के लपेट कर गांठ लगा दो । लपेट कर गांठ लगाई, तो महाराज बाहर खड़े हैं, गांठ कपड़े में आ गई । महाराज बोले - घबराओ मत, होश में आकर गांठ लगाओ । इस प्रकार तीन दफा कियाकिन्तु कमर को नहीं लपेट सका । फिर त्रिलोकशाह घबरा गया और बोला - 
कटि पट में आवै नहीं, पच हार्यो एक दास । 
दादू पूर्ण ब्रह्म है, देख रु भयो हुलास ॥ 
यह कह कर चरणों में नमस्कार किया और बोला - मेरा अपराध क्षमा करो । महाराज बोले - अब कभी साधुओं की परचा की भावना से परीक्षा तो नहीं करोगे ? त्रिलोकशाह - अब कभी ऐसा नहीं करूँगा । महाराज - निष्काम भाव से सेवा करो, जिससे यह जीव स्वस्वरूप को प्रापत हो । यह कहकर वहाँ से प्रस्थान कर गए ।
ऐसे ब्रह्मवेत्ता महापुरुष दादूदयाल जी का तेजपुंज का शरीर किस प्रकार बांधा जा सकता था ?
प्रसंग - 
"गुरु दादू पै सिद्ध द्वै आये लघु करि देह । 
उपदेशत भये तिन्हों को, कहा सिद्धाई येह ॥"
एक समय आमेर में सत्गुरु श्री दादू दयालजी की भजन गुहा में शिलापटों की सन्धि में से दो सिद्ध साधु लघु शरीर धारण करके प्रविशत हुए, उस समय उक्त दो साखियों से उनको उपदेश किया था ।
*नूर तेज ज्यों जोति है, प्राण पिंड यो होइ ।*
*दृष्टि मुष्टि आवै नहीं, साहिब के वश सोइ ॥२००॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! अब जिस प्रकार परमेश्वर का नूर तेज स्वरूप है, उसी भांति ब्रह्मज्ञानी अपने प्राण और स्थूल शरीर को ब्रह्मयोग के द्वारा ज्योतिमय बना लेते हैं । वे महापुरुष संसारीजनों के देखने और बन्धन में नहीं आते हैं । ऐसे महापुरुष साहिब कहिए, ब्रह्म के स्वरूप में अभेद रहते हैं ॥२००॥ 
अहं परम आनन्दमय, अहं ज्योति निज सोइ । 
ब्रह्मयोग ब्रह्म हि भया, दुविधा रही न कोइ ॥ 
श्री दादू दयाल का धाम भैराणा पर्वत मध्य गुफा के सामने "संतों भक्तों ! सत्यराम", "संतों भक्तों ! सत्यराम", "संतों भक्तों ! सत्यराम" आवाज के बाद अंतरिक्ष में श्री दादू दयालजी महाप्रभु ने अपना आभास स्वरूप भी विसर्जन इसी प्रकार से किया था । सगुण से निर्गुण हो अन्तर्धान हो गए ।
गुरु दादू रु कबीर की, काया भई कपूर । 
रज्जब रीझा देख करि, सहगुण निर्गुण नूर ॥ 
श्री दादू दयालजी महाराज का शरीर देखने में दूसरे को मात्र प्रतीत होता था, लेकिन स्वस्वरूप केवल आभास मात्र था तेजोमय ।
(क्रमशः)

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