गुरुवार, 13 दिसंबर 2012

= परिचय का अंग =(४/२३३-५)

॥दादूराम सत्यराम॥
*"श्री दादूदयाल वाणी(आत्म-दर्शन)"* 
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी 
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज 
*= परिचय का अंग - ४ =* 
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*साधु महिमा महात्म*
*अट्ठे पहर अर्श में, ऊभोई आहे ।*
*दादू पसे तिनके, अल्हल गाल्हाये ॥२३३॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! जो संत पुरुष, आठों पहर प्रति श्वास "अर्श" कहिए, हृदय रूप आकाश में "ऊभोई" कहिए, स्थिर चित्त होकर अल्लाह नाम परमेश्वर से,("गाल्हाये" परस्पर वार्तालाप) अभेद भावना रूप परस्पर वार्तालाप करते हैं, उन्हें ही परमेश्वर के स्वरूप का परिचय होता है । और चितावनी पक्ष में, हे संतों ! अविचल भाव से आत्म - परायण होकर ऐसे सतगुरुओं की शरण में जाइये कि जो परमेश्वर से तुम्हारा वार्तालाप करवा दें ॥२३३॥ 
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*अट्ठे पहर अर्श में, बैठा पीरी पसन्नि ।*
*दादू पसे तिन्न के, जे दीदार लहन्नि ॥२३४॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! जो मुक्त संतजन प्रति श्वास अपने हृदय में बैठकर "पीरी" कहिए, परमेश्वर का दर्शन करता है, उन्हें धन्य है ।(पसंनि = दर्शन) ऐसे संतों का दर्शन और सत्संग प्राप्त होना अहोभाग्य है ॥२३४॥ 
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*अट्ठे पहर अर्श में, जिन्हीं रूह रहन्नि ।*
*दादू पसे तिन्न के, गुझ्यूं गाल्हि कन्नि ॥२३५॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! जिनकी सुरति आठों पहर हृदय रूपी आकाश में आत्म - विचार में ही लगी रहती है और परमेश्वर से ही अनहद ध्वनि द्वारा वार्ता करते हैं, उनको हृदय में ही परमेश्वर प्रत्यक्ष होते हैं ॥२३५॥ 
(शब्दार्थ - रूह = सुरति । गुझ्यूं = गुप्त । गाल्हि = वार्तालाप । कन्नि = करना)
भयो प्रसन्न इक जाट पर, पातसाह सब सीस । 
एक बार तुम कान लग, औरन बिसवा बीस ॥ 
दृष्टान्त - एक रोज बादशाह अकबर रेगिस्तान में गया । गर्म की मौसम थी, प्यास से घबरा गया । अकेला ही घोड़े पर सवार था । दूर से देखा तो एक टीले पर झौंपड़ी दिखलाई पड़ी । वहीं पर पहुँचा । वहाँ जाट अपने खेत में बैठा था । जाट ने देखा, कोई बड़ा आदमी है । बादशाह ने जाट की तरफ पानी पीने को इशारा किया । जाट समझ गया और छाया में बैठाया । मिट्टी में से एक तरबूज निकाला और उसके दो टुकड़े किये । बादशाह को दिया । बादशाह की भूख और प्यास दोनों ही निवृत्त हो गई । बादशाह बहुत प्रसन्न हुआ और बोला आज से तूँ मेरा मित्र हो गया । तुझे कभी तकलीफ होवे, तो मेरे पास आ जाना, तेरा दुःख दूर कर दूँगा । जाट बोला - "तेरा नाम क्या है?" "मेरा नाम अकबर है । दिल्ली में आकर पूछ लेना, मुझे सब जानते हैं ।" जाट बोला - "तेरा नाम लिख दे, मैं भूल जाऊँ ।' जाट ठीकरी और कोयला लाया । अकबर ने अपना नाम कोयले से उस ठीकरी पर लिख दिया । जाट ने ठीकरी लेकर छांन में उलटा करके रख दिया । अकबर चला गया । साल दो साल के बाद काल पड़ गया । जाटनी बोली - "उस दिन जो घोड़े पर आया था, उसके पास जाओ और कुछ लाओ । जिससे अपना गुजारा चले ।' जाट ठीकरी लेकर चला और दिल्ली में जा पहुँचा । पूछा - "यहाँ अकबरिया कहाँ रहता है ?" पुलिस वाले ने यह सुनकर एक डंडा जाट के मारा । जाट ने पुलिस वाले का डंडा छीन कर, उसके दो चार जमा दिए । थानेदार वगैरा आ पहुँचे । जाट बोला - "अकबरिया तो मेरा मित्र है, यह देख, मेरे पास उसका नाम लिखा है ।" बादशाह को खबर हुई कि एक जाट आया है । जिसके हाथ में ठीकरी है । हुजूर से मिलना चाहता है और अपने आप को हुजूर का दोस्त बतलाता है । बादशाह को याद आ गया । बादशाह बोला - दरबार में ले आओ । जब जाट को दरबार में लाये, तो दरबार का ठाट - बाट देखकर जाट चकित हो गया । मन में विचार किया, मैं अब जाट ही बना रहूँ तो ठीक होगा । जाट बोला - "अरे मित्र ! तेरे को इन सबने यहाँ बन्द कर रखा है ? तेरे को यहाँ से निकलने नहीं देते हैं ?' जाट के हाथ में एक लाठी भी थी, "तूँ कहे तो, एक - एक को ठीक कर दूँ ।" सभी दरबारी चकित हो गए । अकबर मुस्कराने लगा और बोला - आओ मित्र, बैठो । एक कुर्सी पर उसको बैठाया और बादशाह ने दरबार बर्खास्त कर दिया । जाट से पूछा - कैसे आया है ? जाट बोला - नहीं, मैं जाट हूँ कमा कर खाने वाला, दान का नहीं लूंगा, मुझे तो कुछ काम बता । बादशाह ने सोचा - इसको क्या काम बताऊँ ? तूँ ही बता, तूँ क्या काम कर सकता है ? जाट - दरबार में तेरी बराबर, एक चांदी की कुर्स मेरे लिए भी लगवा । तूँ सोने की पर बैठेगा और मैं चांदी की पर बैठूं । जब मैं तेरी तरफ मुँह करूँ, तो तूँ मेरी तरफ कान कर देना । बस यही मेरी नौकरी है । बादशाह ने कहा - "अच्छी बात है ।' दूसरे दिन बादशाह ने यह प्रस्ताव रखा कि हमने एक जाट को मंत्री रखा है और उसकी हमारी बराबर एक कुर्सी लगेगी । सर्व सम्मति से प्रस्ताव पास हो गया । जाट आकर कुर्सी पर बैठा बादशाह के बराबर और दरबार में जितने राजा, महाराजा, नवाब बैठे थे, उनको घूर - घूर कर देखने लगा । एक राजा की तरफ क्रूर दृष्टि से घूर कर देखा और बादशाह की तरफ मुँह किया । बादशाह ने उसकी तरफ कान कर दिया । राजा के रोमांच खड़े हो गए । न मालूम, इसने बादशाह को क्या शिकायत की है ? दरबार बर्खास्त हो गया । जाट अपने महलों में पहुँचा । राजा जाट के पास गया और बोला - हम पर तो दया ही रखना । जाट बोला - दया तो गया में छोड़ आया मैं । कुछ भेंट पूजा दिया करो । नहीं तो तुम जानते हो, बादशाह मेरे कहे में है । राजा ने दो थैलीयाँ अशर्फियों की पहुँचा दीं । जाट ने अपने बाल - बच्चों को भी महलों में बुला लिया । सभी खूब मौज करने लगे । दूसरे दिन ऐसे ही किसी नवाब को पकड़ लिया । ऐसे प्रतिदिन एक आध आसामी पकड़ लेता । करते - करते साल भर खत्म हो गया । एक दिन बादशाह बोला - "कुछ प्राप्त भी किया या ऐसे ही कान की तरफ मुँह करता है ? "हुजूर ! मेरा निमंत्रण स्वीकार करिये ।" "मेरे साथ तो तमाम काफिला है ।" "हाँ हुजूर ! काफिला के साथ आपको निमंत्रण है ।"
जब क्रम - क्रम से सब लोग जाट के यहाँ भोजन कर चुके और बादशाह सलामत जाट के यहाँ पहुँचे, तो एक लाख अशर्फी नजर की । एक लाख अशर्फियों के ऊपर गद्दी लगाकर बैठाया । सोने के थाल वगैरा में अनेकों प्रकार के पदार्थ परोसे गए । जब बादशाह वापिस आने लगा, तब एक लाख अशर्फी फिर नजर की । बादशाह बोले, "कुछ तैंने भी रखा है या मुझे ही सब दे दिया ।" तब जाट बादशाह को अपने महल में ले गया और एक कमरा खोला । आंगन से छत तक अशर्फियों की थैलियाँ ठँसी हुई भरी थीं । दूसरा फिर कमरा खोला । ऐसे दो तीन कमरे बादशाह को दिखाए । बादशाह बोला - "अरे ! इतना धन तो मेरे पास भी नहीं है, तूँ कहाँ से लाया ?" जाट बोला - हुजूर के कान की बदौलत यह सब धन कमाया है ।
ऐसे ही दार्ष्टान्त में जो अनन्य भक्त परमेश्वर के हैं, उनकी बात को परमेश्वर कान लगाकर सुनते हैं ।
(क्रमशः)

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