बुधवार, 12 दिसंबर 2012

= परिचय का अंग =(४/२३०-२)


॥दादूराम सत्यराम॥ 
*"श्री दादूदयाल वाणी(आत्म-दर्शन)"* 
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी 
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज 
*= परिचय का अंग - ४ =* 
*दादू सब तन तसबी कहै करीमं, ऐसा करले जापं ।*
*रोजा एक दूर कर दूजा, कलमा आपै आपं ॥२३०॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! इस नर तन को ही माला रूप करके "करीम" कहिए, कृपालु परमेश्वर राम - नाम का स्मरण करो । ऐसा स्मरण रोम - रोम से करो और इस प्रकार भजन करके अपने द्वैतभाव को दूर करना ही रोजा है और स्वस्वरूप में अनलहक रूप से अभेद हो जाना ही मानो, कलमा पढ़ना है । अर्थात् व्यावहारिक कलमा तो मस्जिद में जाकर सभी पढ़ते हैं परन्तु इसी कलमा को अन्तर्मुख आत्म - परायण होकर पढ़िये, तभी जीव आत्मा का उद्धार होगा ॥२३०॥ 
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*दादू आठों पहर अलह के आगै, इकटक रहिबा ध्यानं ।*
*आपै आप अर्श के ऊपर, जहाँ रहै रहमानं ॥२३१॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! आठ पहर और चौसठ घड़ी हृदय रूपी आकाश में एक परमेश्वर का ही ध्यान करो । वहीं पर तुम्हारा ध्येय स्वरूप परमात्मा निवास करता है । उसी में अपनी लय लगाकर अभेद रहो ॥२३१॥ 
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*दादू अट्ठे पहर इबादती, जीवण मरण निबाहि ।*
*साहिब दर सेवै खड़ा, दादू छाड़ि न जाहि ॥२३२॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! आठों पहर जन्म से मरण पर्यन्त परमेश्वर की अराधना में ही संलग्न रहो और सर्व अन्तर्यामी भाव से परमात्मा को सर्वत्र प्रत्यक्ष करोएवं कभी भी आत्म - विमुख मत हो ॥२३२॥ 
(क्रमशः)

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