॥दादूराम सत्यराम॥
*"श्री दादूदयाल वाणी(आत्म-दर्शन)"*
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज
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*= परिचय का अंग - ४ =*
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*अट्ठे पहर अर्श में, लूंड़ींदा आहीन ।*
*दादू पसे तिन्न के, असां खबर डीन ॥२३६॥*
टीका - हे जिज्ञासुओं ! मुक्तजन अपने अन्तःकरण में स्थिर होकर इष्ट पदार्थ को प्राप्त होते हैं । ऐसे परिचय स्वरूप सतगुरुओं के दर्शन कीजिये, क्योंकि ऐसे सतगुरुओं ने हमारे को परमानन्द की खबर दी है ॥२३६॥
(शब्दार्थ - लूंड़ींदा = चाह । आहीन = आकर । असां = हमारे को)
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*अट्ठे पहर अर्श में, वजी जे गाहीन ।*
*दादू पसे तिन्न के, कितेई आहीन ॥२३७॥*
टीका - सदैव अन्तःकरण में देहाध्यास मिटा करके जिन्होंने भगवान् का चिंतन किया है, उन्हीं के दर्शन करने चाहिये । किन्तु ऐसे संत कोई बिरले ही हैं ॥२३७॥
(वजी = जाने का । गाहीन = गाकर । आहीन = आना)
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*रस प्रेम प्याला*
*प्रेम प्याला नूर का, आशिक भर दीया ।*
*दादू दर दीदार में, मतवाला कीया ॥२३८॥*
टीका - हे जिज्ञासुओं ! परमेश्वर ने अपने नूर स्वरूप का प्रेमरूपी प्याला अपने आत्मीय जनों को आप ही भर कर दिया है और दर कहिए, हृदय में ही दर्शन देकर अपने भक्तों को मस्त किया है ॥२३८॥
सिवली ज्यों रस पीजिये, जान सकत नहीं कोइ ।
प्रगट किये मंसूर ज्यूं, सब जग बैरी होइ ॥
दृष्टान्त - यह सिवली मंसूर राबिया की बहन थी । रात्रि को जब सब घर वाले सो जाते, तब वह घर से चलती और नगर के बाहर एक महात्मा की कुटिया पर जाती और उनका सत्संग करती, ज्ञान अमृत पीती, फिर घर आ जाती । इस प्रकार इसका हमेशा यह क्रम चलता रहा । एक रोज जब यह जा रही थी, तब एक सांसारिक व्यक्ति ने इसको देखा और सवेरे मंसूर राबिया से बोला - तुम्हारी बहन रात को अमुक साधु के पास जाती है । मंसूर उसको बोले - जाती होगी, मेरा क्या लेती है ? परन्तु फिर विचार किया कि क्यों जाती है ? पहले आंखों से देखें, उसके बाद उससे बात करें । यह सोचकर जब रात्रि को वह दरवाजा खोलकर चली, तब पीछे - पीछे मंसूर भी चले । जब वह महात्मा की कुटिया में पहुँची । यह कुटिया के पीछे जा बैठा । सिवली ने महात्मा को नमस्कार किया । महात्मा बोले - बेटी, आ गई । सिवली बोली - हाँ पिता, आ गई । महात्मा ब्रह्म - विद्या का उपदेश करने लगे । आधी रात में महात्मा के लिए अमृत का प्याला भगवान् के दरबार से आता । महात्मा ने आधा पीया और बोले - लो बेटी, आधा तुम पी लो । तब मंसूर ने मन में विचार किया कि यह कुछ पी रहे हैं, तूँ भी माँग ले । पीछे से बोला - "बहन ! मुझे भी पिलाना ।" सिवली बोली - "मंसूर ?" वह बोला - "हाँ" । "आ जा, फिर वहाँ क्यों बैठा है ?" मंसूर आया, महात्मा को नमस्कार किया और बैठा - "मुझे भी जो तुमने पीया, वह पिलाओ ।" सिवली बोली - मैंने तो पीलिया, इसमें तो कुछ है नहीं । महात्मा जी ने अपने करमण्डलु में से उस प्याले में थोड़ा जल डाल दिया और बोले - इसको धोकर पी ले । जैसे ही मंसूर ने पीया, पीते ही अज्ञान नष्ट हो गया और पुकार उठा - "अनलहक । सिवली ! अनलहक ।" इसके मायने हैं "मैं खुदा हूँ" । सिवली तो गुरुजी को नमस्कार करके घर चली गई और मंसूर ज्ञान मस्त होकर, "अनलहक, अनलहक" बोलता हुआ घूमने लगा । काजी मुल्ला यह सुनकर बादशाह के दरबार में बोले - मंसूर काफिर हो गया । कभी अपनी बहन को खुदा बताता है, कभी खुद खुदा बनता है । बादशाह ने बुलाया और कहा - मंसूर क्या बोलता है ? मंसूर बोला - "अनलहक । सिवली अनलहक ।" बादशाह ने हुक्म दिया कि इसको चौराहे में गड्ढा खोदकर गर्दन तक जमीन में गाड़ दो और जिसके जो चीज हाथ में होवे, उसी से इसको मार - मार कर जान निकाल दो । वैसा ही करने लगे । तब एक सिवली नाम के फकीर भी थे । उनको साथ लेकर बादशाह आया और बादशाह सिवली साहब को बोले - आप भी मारिये इसको । मंसूर "अनलहक ! अनलहक !" की ध्वनि कर रहा था । सिवली साहब बोले - बादशाह सलामत ! आप सब लोग मार रहे हो । मैं एक न मारूं तो क्या हर्जा है ? बादशाह बोले - नहीं साहब, यह तो सिरे की बात है, आपको मारना चाहिये । सिवली साहब ने एक फूल की पत्ती लेकर मंसूर के सिर पर डाली । मंसूर बोला - "हाय ! हाय ! मर गया" । बादशाह के सहित सब लोग सुनकर चकित रह गये । सिवली साहब बोले - मंसूर ! एक पत्ती से तुम हाय मर गया बोला और यह सब मार रहे हैं, इनकी चोट तुझे नहीं लगी । मंसूर बोले - ये अज्ञानी हैं, इनकी चोट मेरे नहीं लगती । परन्तु आपने ज्ञानी होकर मारा, आपकी चोट मेरे लगेगी ।" फिर वैसे ही "अनलहक अनलहक" कहने लगा । और बोला -
अगर है शोक मिलने का, तो हरदम लै लगाता जा ॥ टेक ॥
न रख रोजा, न मर भूखा, न जा मस्जिद, न कर सिजदा ।
वजू का तोड़ दे कूजा, शराबां शोक पीता जा ॥१॥
पकड़ कर इश्क की झाडू, सफा कर दिल के हजूरे को ।
दुई की धूल को लेकर, मुस्सलं पर उड़ाता जा ॥२॥
फेंक तसबी, तोड़ धागा, किताबें डाल पानी में ।
मशायक बनके बैठा रह, मशीयत को सिखाता जा ॥३॥
कहै मंसूर सुन काजी, निवाला कहर का मत खा ।
"अनलहक" को सभी जानें, यही कलमां पढाता जा ॥४॥
(क्रमशः)

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