॥दादूराम सत्यराम॥
*"श्री दादूदयाल वाणी(आत्म-दर्शन)"*
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज
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*= परिचय का अंग - ४ =*
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*ज्यों रसिया रस पीवतां, आपा भूलै और ।*
*यों दादू रह गया एक रस, पीवत पीवत ठौर ॥२७१॥*
टीका - हे जिज्ञासुओं ! अब स्वयं परमेश्वर अपने भक्तों को उपदेश करते हैं कि जैसे रस का रसिया रस का आस्वादन अपनी ही प्रसन्नता के लिये लेता है, किन्तु रस पीवतां कहिए, आपा और परायापन के भाव को भूल जाते हैं । इसी प्रकार भक्ति - रस का आस्वादन लेते हुए भक्तजन माया व ब्रह्मभाव को भूलकर भक्तिरस में ही अभेद हो रहे है । अथवा हे मुमुक्षुओं ! रसिया की भांति परमेश्वर में अभेद होइये, तो शरीर आदिक का अध्यास भूलोगे ॥२७१॥
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*जहँ सेवक तहँ साहिब बैठा, सेवक सेवा मांहि ।*
*दादू सांई सब करै, कोई जानै नांहि ॥२७२॥*
टीका - हे जिज्ञासुओं ! जब भक्तजन परमेश्वर की भक्ति में एकरस होते हैं, तो भक्तों के हृदय में ही प्रकाशमान होकर अपने भक्तों की योग, क्षेम आदिक सब सेवायें परमेश्वर आप स्वयं करते हैं, किन्तु इस बात को भक्तों के अतिरिक्त दूसरा कोई नहीं जान पाता ॥२७२॥
सांभर नूँता सात को, भोगे दादू होइ ।
एक दिवालै भाकसी, दादू देखे दोइ ॥
"जैमल" जप हरि नाम को, हरिजी जैमल होइ ।
सैन्य हनी रणभूमि में, मर्म न जान्यो कोइ ॥
दृष्टान्त - सांभर झील में जब ब्रह्मऋषि विराजते थे, एक रोज एक साहूकार ने महाराज को घर ले जाने का निमंत्रण दिया । इस प्रकार उसी दिन सात निमंत्रण आए । महाराज ने विचार किया कि प्रभु भेज रहे हैं, आप ही स्वयं भक्तों के यहाँ पधारेंगे । प्रभु की प्रेरणा से पहले निमंत्रण आया, उसके साथ ब्रह्मऋषि पधार गए । फिर बाद में ब्रह्मऋषि का रूप बनाकर भगवान स्वयं झील में बैठ गए और दूसरा आया, तो उसके साथ चले गए । इस प्रकार सात निमन्त्रण भगवान ने दादू जी के रूप में जीमे । तब भक्तों को जानकारी हुई कि आज महाराज ने अपने सात रूप बनाए और सातों भक्तों की इच्छा पूर्ति की, परन्तु भगवान ने ब्रह्मऋषि को प्रगट करने के लिए लीला रची थी ।
*दूसरा परचा* - सांभर के हाकिम ने मजहबी लोगों के कहने पर दादूदयाल ब्रह्मऋषि को बुलवाकर कारागृह में बन्द कर दिया । परमेश्वर दादूदयाल का रूप बनाकर उसी देवालय में बैठ गए और पद गाने लगे । जब हाकिम को पता चला कि वह कारागृह में भी और कुटी में भी बैठे हैं, तब कारागृह से मुक्त करके चरणों में नत - मस्तक होकर प्रणाम किया और चरणों की धूल मस्तक में रमा कर महाराज के ज्ञान को ग्रहण करके कृत - कृत्य हो गया ।
*तीसरा परचा* - जैमल जी चौहान बौंली ग्राम के जागीरदार थे । ये दादूजी के प्रधान ५२ शिष्यों में माने जाते हैं । बौंली ग्राम को प्राचीन समय में "खालड़" और आजकल सबलपुर कहते हैं । जयमलजी चौहान अपना अधिकांश समय भगवद् भजन में लगाते थे । एक दिन प्रातःकाल जब वे भगवद्भक्ति में तल्लीन थे, एक द्वेषी ठाकुर ने दल - बल के साथ उनके ठिकाने पर चढ़ाई कर दी ।
तब अपने परमभक्त पर आई विपत्ति को टालने के लिये भगवान् ने सैन्य दल - बल सहित जयमल का रूप धारण करके शत्रु से जा भिड़े और शत्रु - दल को मार भगाया । जब विजयी सैन्य - दल ने ग्राम में आकर परमवीर जयमलजी द्वारा रणक्षेत्र में प्रदर्शित अद्भुत शूरवीरता का गुणगान लोगों को सुनाया तो लोग आश्चर्यान्वित होकर कहने लगे कि राव साहब जैमलजी तो भोर से ही पूजन - पाठ व हरिनाम स्मरण में व्यस्त हैं, बाहर निकले ही नहीं, देख लो ! परन्तु सभी सैनिक दावे के साथ कह रहे थे कि वे जोश - खरोश के साथ युद्धक्षेत्र में हमारा नेतृत्व कर रहे थे । जब सबने महल में जाकर जयमलजी को नाम - स्मरण में ध्यान - मग्न देखा तो उन्हें पूर्ण विश्वास हो गया कि भक्त - वत्सल भगवान् ने ही उनका दूसरा रूप धारण कर लिया था । इससे उनकी प्रसिद्धि दूर - दूर तक फैल गयी थी ।
*ईर्ष्या* - एक दुष्ट भेषधारी ने उन्हें मारने के लिये उन पर मारण - मन्त्र(मूठ) का प्रयोग भी किया था, जिसका जयमलजी चौहान ने तत्काल "रामरक्षा मन्त्र" की रचना करके मूठ को वापस लौटा दिया था । यह राम रक्षा - मन्त्र अत्यन्त प्रभावी है, जिसका चमत्कार देखा जा सकता है । साधु लोग इसका झाड़ा देकर भूतबाधा, रोग कष्ट आदि अनेक व्याधियों से व्यथित व्यक्तियों का कष्ट - निवारण करते देखे जाते हैं ।
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*दादू सेवक सांई वश किया, सौंप्या सब परिवार ।*
*तब साहिब सेवा करै, सेवक के दरबार ॥२७३॥*
टीका - हे जिज्ञासुओं ! भक्तजन अपने मन इन्द्रियों के समस्त विषय - व्यापार से हटकर और व्यावहारिक धन, धान्य, पुत्र, स्त्री इन सबको परमेश्वर के अर्पण करके भक्ति में अखंड लीन रहते हैं । इस प्रकार सेवक ने परमेश्वर को अपने वश में कर लिया है और फिर परमेश्वर सेवक का सर्व व्यवहार आप ही पूरा करते हैं । भक्तजन प्रभु के पूर्ण सामथ्र्य भाव को अनुभव करके सदा निश्चेष्ट रहते हैं ॥२७३॥
"अनन्याश्चिनायन्तो मां ये जनाः पर्युपासते ।
तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं बहाम्यहम् ॥
(गीता ९ - २२)
बलि प्रभु जीवन वश किये, तन धन सर्वस दीन्ह ।
दरवाजे दरबान ज्यों निसदिन सेवा कीन्ह ॥
दृष्टान्त - भक्त प्रहलाद के पौत्र और राजा विरोचन के पुत्र का नाम बलि था । उसने अपने गुरु शुक्राचार्य के मन्त्र और अपनी शक्ति से तीनों को जीत लिया और इन्द्र पद भी प्राप्त कर लिया । देवता उससे त्रस्त थे । वे अपनी रक्षा के लिये भगवान् विष्णु की शरण गये । क्योंकि राजा बलि निष्पापी और महादानी था, अतः भगवान् उससे युद्ध तो कर नहीं सकते थे ।
विष्णु ने तपस्वी ब्राह्मण का वेश बनाकर वामन रूप में बलि के पास गये और उसकी प्रशंसा के साथ उसके पूर्वजों का भी यश - गान करने लगे । आपके पितामह प्रहलाद की दृढ़ भक्ति और भगवत्प्रेम के आगे भगवान् को स्तम्भ चीर कर नृसिंह रूप में प्रकट होना पड़ा । आपके पिता विरोचन तो इतने उदारमना थे कि विप्रवेशधारी इन्द्र को उसकी याचना पर अपनी युवावस्था प्रदान कर दी । आपके प्रपितामह भी महान् वीर थे । आप बड़े भाग्यवान् हैं । अपनी व अपने पूर्वजों की प्रशंसा से प्रसन्न होकर राजा बलि ने कहा - वामनदेव, आप जो भी चाहें, मांग लीजिये । मैं देने को तैयार हूँ ।
वामन बोले - आज प्रातः मैं किसी सेठ के आँगन पर बैठा संध्या - पूजा कर रहा था तो उसने मुझे वहाँ से भगा दिया । मेरी संध्या अपूर्ण रह गई । मैंने सोचा कि मेरी भी अपनी थोड़ी सी जमीन हो तो निःसंकोच होकर अपनी संध्या - पूजा तो कर सकूं । अतः मात्र तीन कदम भर भूमि आप मुझे दान कर दें तो आप पुण्य के भागी होंगे । राजा बलि - महाराज, आपने मात्र इतना ही क्यों मांगा ? मैं तीन कदम भूमि तो क्या तीन ग्राम दे सकता हूँ । तीन कदम भूमि देते हुए तो मुझे बड़ा संकोच और लज्जा हो रही है ।
वामन - मैं तो संतोंषी ब्रह्मचारी ब्राह्मण हूँ । आवश्यकता से अधिक की इच्छा व संग्रह लोभ कहलाता है । लोभ असन्तोष तथा संग्रह विग्रह उत्पन्न करता है । मैंने गत जन्म में किसी को कुछ भी नहीं दिया था, इसीलिये मेरी ऐसी दशा हुई कि मुझे भिखारी बनना पड़ा । यदि आप दान नहीं दोगे तो आपकी भी ऐसी ही दशा होगी । यह मैं इसलिये कह रहा हूँ कि भिखारी मात्र भीख मांगने के लिये नहीं, मधुर वचनों या संगीत के माध्यम से लोगों को सन्मार्ग का ज्ञान करावें - "भिक्षुकाः नैव भिक्षन्ति, बोधयन्ति गृहे गृहे ।"
यह सदुपदेश सुनकर राजा बलि ने विप्र वामन को तीन कदम भूमि का दान संकल्पित कर दिया । ऐसा करते ही वामन ने विराट् स्वरूप धारण कर लिया और एक ही कदम में सारी पृथ्वी नाप ली । दूसरे चरण में ब्रह्मलोक को व्याप्त कर लिया । जब कोई स्थान ही नहीं बचा तो बलि ने दैन्य भाव से अपना मस्तक झुकाकर कहा - आप अपना तीसरा चरण मेरे मस्तक पर रखिये ।
परमात्मा द्रवित होकर बोले - तुमने मुझे सर्वस्व समर्पण कर दिया तो मैं तुम्हारा ऋणी हो गया । मैंने इन्द्र को स्वर्ग का राज्य दिया है, तुम्हें पाताल का राज्य देता हूँ और द्वारपाल बनकर मैं इसकी चौकसी करूँगा । अब मैं सेवक बनकर तुम्हारी सेवा करूँगा । जो आपा(अहंकार) भेंटकर प्रभु को वन्दन करता है, वही उसे बन्धन में रख सकता है ।
(क्रमशः)

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