॥दादूराम सत्यराम॥
*"श्री दादूदयाल वाणी(आत्म-दर्शन)"*
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज
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*= परिचय का अंग - ४ =*
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*तेज पुंज "को बिलसना", मिलि खेलें इक ठांव ।*
*भर भर पीवै राम रस, सेवा इसका नांव ॥२७४॥*
टीका - हे जिज्ञासुओं ! संतजन परमेश्वर का स्वरूप अनुभव करके उसी में अभेद होते हैं । "भर भर पीवैं राम रास" भक्तिभाव में पूर्ण लीन होकर भी संत भक्तिरस से तृप्त नहीं होते और अतृप्त भाव से निरंतर राम - रस में ही रत्त रहते हैं ॥२७४॥
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*अरस परस मिल खेलिये, तब सुख आनंद होइ ।*
*तन मन मंगल चहुँ दिशि भये, दादू देखे सोइ ॥२७५॥*
टीका - हे जिज्ञासुओं ! स्वस्वरूप का साक्षात्कार करके मुक्तजन परम सुखी होते हैं । ऐसे मुक्तजनों के तन,मन और चारों दिशायें मंगलमय हो जाती हैं और ये सर्वत्र परमात्मा को ही प्रत्यक्ष करते हैं ॥२७५॥
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*सुन्दरी सुहाग*
*मस्तक मेरे पांव धर, मंदिर माहीं आव ।*
*सैंयां सोवै सेज पर, दादू चम्पै पांव ॥२७६॥*
टीका - हे प्यारे स्वामिन् ! आपके मिलने की मेरी जिज्ञासा को पूरी करें और मेरे अहंकाररूपी मस्तक पर आप अपने चरण रखकर मेरे हृदयरूपी मंदिर में प्रगट होइये । हे स्वामिन् ! आप मेरी वृत्ति रूपी सेज पर विराजिये ताकि मैं आपके पुंज रूपी चरणों को स्पर्श करके, कृत - कृत्य भाव को प्राप्त हो जाऊँ ॥२७६॥
तेज पुंज के चरण हैं, हाड़ चाम के नाहिं ।
तुलसी वेदों वर्णिये, हृदय कमल के माहिं ॥
(क्रमशः)

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