शुक्रवार, 21 दिसंबर 2012

= परिचय का अंग =(४/२६९-७०ख)

॥दादूराम सत्यराम॥
*"श्री दादूदयाल वाणी(आत्म-दर्शन)"* 
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी 
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज 
*= परिचय का अंग - ४ =*
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*पीव सौं खेलूँ प्रेम रस, तो जियरे जक होइ ।*
*दादू पावै सेज सुख, पड़दा नाहीं कोइ ॥२६९॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! पूर्वोक्त कही हुई जो सौंज सामग्री है, उसको धारण करके प्रेम रस से परिपूर्ण भक्तजन जब अपने प्रीतम से खेलें, कहिए, स्वस्वरूप साक्षात्कार करें, तो संतों को पूर्ण संतोंष होता है । अर्थात् हृदयरूपी सेज पर संतात्मा ब्रह्मभाव अनुभव करके निरावरण होते हैं । फिर मुक्तजनों में कोई भी इच्छा, वासना नहीं रहती है ॥२६९॥ 
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*सूक्ष्म सौंज*
*सेवक बिसरै आप कौं, सेवा बिसरि न जाइ ।*
*दादू पूछै राम कौं, सो तत्त कहि समझाइ ॥२७०क॥* 
टीका - हे प्रभु ! आपकी भक्ति में ऐसी क्या अपूर्वता है, जो आपके भक्तजन अपने आपको भी भूल जाते हैं, परन्तु आपकी भक्ति को नहीं भूलते हैं । अर्थात् आपके भक्ति अमृत का निरंतर पान करके भी तृप्त नहीं होते हैं । यद्यपि भक्ति परमेश्वर की प्राप्ति का साधन मात्र है, तथापि भक्ति की यही एक अगाध महिमा है कि भक्त जन परमेश्वर का दर्शन करके भी भक्ति अमृत से तृप्त नहीं होते हैं और परमेश्वर से भी यही मांगते हैं कि "भक्ति मांगूं बाप भक्ति मांगूं, मूनैं थारा नामनो प्रेम लागो." इस प्रकार भक्ति की ही याचना करते हैं, क्योंकि भगवान् भक्ति - प्रिय हैं ॥२७०क॥ 
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*दादू सूतां पीछे सुरति निरति सूं, बालक ज्यूं पय पीवे ।*
*ऐसे अन्तर लगन नाम सूं, आतम जुग - जुग जीवे ॥२७०ख॥* 
भागवत् में भगवान् ने उद्धव जी से कहा है - 
न साध्यति मां तु योगो, न सांख्यं धर्म उद्धव ! 
न स्वाध्याय तपस्त्यागो, यथा भक्तिर्ममोर्जिता ॥ 
हे उद्धव ! योग, ज्ञान, स्वाध्याय, तप और वैराग्य मुझे उस प्रकार वश नहीं कर सकते, जिस प्रकार की प्रबला भक्ति मुझे वश करती है ।
उमा योग जप दान तप, नाना व्रत मख नेम । 
राम कृपा नहिं करहिं तस, जसि निस केवल प्रेम ॥ 
(क्रमशः)

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