॥दादूराम सत्यराम॥
*"श्री दादूदयाल वाणी(आत्म-दर्शन)"*
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज
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*= परिचय का अंग - ४ =*
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*बिन श्रवणहुँ सब कुछ सुनै,*
*बिन नैनहुँ सब देखै ।*
*बिन रसना मुख सब कुछ बोलै,*
*यहु दादू अचरज पेखै ॥२१६॥*
टीका - हे जिज्ञासुओं ! परमेश्वर बिना कानों के ही सब कुछ सुनता है और बिना नेत्रों के ही सब कुछ देखता है । बिना जिह्वा के ही सब कुछ स्वाद लेता है और बोलता है । इस प्रकार संतजन यह अद्भुत आश्चर्य देखते हैं ॥२१६॥
अपाणिपादो जवनो गृहीता
पश्यत्यचक्षुःसश्रुणोत्यकर्णः ।
स वेत्तिवेद्यं न च तस्यास्ति वेत्ता
तमाहुरग्रंथ पुरुषं महान्तम् ॥
(श्रुतिः)
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*सब अंग सब ही ठौर सब, सर्वंगी सब सार ।*
*कहै गहै देखै सुनै, दादू सब दीदार ॥२१७॥*
टीका - हे जिज्ञासुओं ! "सर्वंगी" कहिए, सब अंगों वाले भगवान् के अंग कहिए हाथ, पैर, मुख, नेत्र आदि, दिव्य रूप हैं । इसलिए हे जिज्ञासुओं ! तुम भी "दिव्यरूप", मल - विक्षेप आवरण से रहित, होकर सर्वत्र परमेश्वर का ही दर्शन करो और उसी की चर्चा श्रवण करो ॥२१७॥
"एको देवः सर्वभूतेषु गूढ़ः,
सर्वव्यापी सर्वभूतान्तरात्मा ।
कर्माध्यक्षः सर्वभूताधिवासः,
साक्षी चेता केवलो निर्गुणश्च ॥"
(उपनिषद्)
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*कहै सब ठौर, गहै सब ठौर,*
*रहै सब ठौर, जोति परवाने ।*
*नैन सब ठौर, बैन सब ठौर,*
*अैन सब ठौर, सोई भल जाने ॥*
*सीस सब ठौर, श्रवण सब ठौर,*
*चरण सब ठौर, कोई यहु माने ।*
*अंग सब ठौर, संग सब ठौर,*
*सबै सब ठौर, दादू ध्याने ॥२१८॥*
टीका - हे जिज्ञासुओं ! सब जगह परमेश्वर ही कहता है और परमेश्वर ही उसे ग्रहण करता है । सब जगह परमेश्वर ही रहता है । उसी की ज्योति को "परवाने" कहिए, मानो वह भरपूर है । उसके नेत्र सर्वत्र हैं । सब जगह उसके बैन है, वही बोल रहा है । सब ठौर वही साक्षात्कार हो रहा है । वही "भल" कहिए, जानने के योग्य है । परमेश्वर का मस्तिष्क सब जगह है । सभी स्थान पर उसके श्रवण हैं और सभी जगह उसके चरण हैं । सब जगह उसके अंग व्याप्त हैं । सबके साथ वही है । सब कुछ वही है और सब ठौर वही है । कोई भक्त उस प्रभु का ऐसा स्वरूप मानकर उसका ध्यान करते हैं ॥२१८॥
"ऊँ सहस्त्रशीर्षा पुरुषः सहस्त्राक्षः सहस्त्रपात् ।
सभूमिं सवेतः वत्वात्य तिष्ठद् दशांगुलम् ॥"
"समस्त साक्षी सर्वात्मा, सर्वभूतगुहाशयः ।
सर्वेन्द्रियगुणाभासः, सर्वेन्द्रियविवर्जितः ॥"
सब ठाहर चेतन बसै, रज्जब रमता राम ।
इस समझे का फल इह, बुरा न करना काम ॥
इनमें समष्टि चैतन्य के स्वरूप का दिग्दर्शन है । सब दिशाओं में, सब लोकों में ,सब भूतों में, जड़ - चेतन में, सब स्थितियों में, उसी व्यापक शक्ति की सत्ता है । वह ज्ञानियों को प्रत्यक्ष है ।
(क्रमशः)

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