॥दादूराम सत्यराम॥
*"श्री दादूदयाल वाणी(आत्म-दर्शन)"*
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज
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*= परिचय का अंग - ४ =*
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*तेज ही कहना, तेज ही गहना,*
*तेज ही रहना सारे ।*
*तेज ही बैना, तेज ही नैना,*
*तेज ही अैन हमारे ।*
*तेज ही मेला, तेज ही खेला,*
*तेज अकेला, तेज ही तेज सँवारे ।*
*तेज ही लेवे, तेज ही देवे,*
*तेज ही खेवे, तेज ही दादू तारे ॥२१९॥*
टीका - हे जिज्ञासुओं ! सर्वत्र परमात्मा के तेज स्वरूप का ही विचार करिये और तद् अनुसार ही परमात्मा को तेजोमय एवं सर्वव्यापक जानकर ही व्यवहार करिये, क्योंकि परमेश्वर का यह तेज स्वरूप ही नामरूप होकर इन संसार दुःखों से पार उतारेगा । अथवा जो संत ब्रह्म - परिचय हैं, वे ब्रह्म के तेज स्वरूप को ही कहते हैं और तेज स्वरूप का ही भजन करते हैं ॥२१९॥
"अन्तज्र्योतिः स्वयं ज्योतिरात्मज्योतिः शिवोSस्म्यहम् ।
ज्योतिर्लिंग भ्रुवोर्मध्ये नित्यं ध्यायेत् सदा यतिः ॥"
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*नूर हि का धर, नूर हि का घर,*
*नूर हि का वर मेरा ।*
*नूर हि मेला, नूर हि खेला,*
*नूर अकेला, नूर हि मंझ बसेरा ।*
*नूर हि का अंग, नूर हि का संग,*
*नूर हि का रंग मेरा ।*
*नूर हि राता, नूर हि माता,*
*नूर हि खाता दादू तेरा ॥२२०॥*
टीका - हे जिज्ञासुओं ! जो जीवनमुक्त संत हैं उनको "धर" कहिए पृथ्वी आदिक सम्पूर्ण नामरूप संसार प्रपंच, ब्रह्मा का ही स्वरूप प्रतीत होता है और उन जीवनमुक्त संतों का निवास, नूर स्वरूप ब्रह्म में ही है । चितावणी पक्ष में, यह जो धर और घर और मनुष्य शरीर आदिक जो प्रत्यक्ष हैं, वे भगवान् के ही स्वरूप हैं । इसलिए ब्रह्म स्वरूप नूर ही हमारा स्वामी है । अब हे जिज्ञासुओं ! आप ब्रह्म स्वरूप नूर में ही राता = रत और माता = मत्त होकर मतवाले रहो । दादू पद से यहाँ अधिकारी को उपदेश है ॥२२०॥
"अन्तज्र्योतिः बहिज्र्योतिः प्रत्यग्ज्योतिः परात्परम् ।"
(क्रमशः)

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