रविवार, 9 दिसंबर 2012

= परिचय का अंग =(४/२१३-५)


॥ दादूराम-सत्यराम ॥
*"श्री दादूदयाल वाणी(आत्म-दर्शन)"* 
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी 
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज 
*= परिचय का अंग - ४ =* 
*दादू मैं ही मेरी जाति में, मैं ही मेरा अंग ।*
*मैं ही मेरा जीव में, आप कहै प्रसंग ॥२१३॥* 
टीका - परमेश्वर कहते हैं, जिन भक्तों ने मुझे अपनी जाति जाना है, वे भक्त मेरी जाति हैं । जिन मेरे भक्तों ने मुझे अपना अंग समझा है,वे भक्त मेरा अंग हैं । जिन भक्तों ने मुझे अपना जीव जाना है, उनके जीव में मैं स्थित हूँ । ब्रह्मऋषि कहते हैं कि भगवान् आप, अपने भक्तों को यह प्रसंग उपदेश करते हैं ॥२१३॥ 
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*दादू सबै दिशा सो सारिखा, सबै दिशा मुख बैन ।*
*सबै दिशा श्रवणहुँ सुने, सबै दिशा कर नैन ॥२१४॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! मैं दशों दिशाओं में समानभाव से व्यापक हूँ । सब दिशाओं में वक्तृत्व शक्तिमय ही मेरा मुख है और सर्वत्र मैं ही कानों से सुनता हूँ । इसी प्रकार हाथ, पाद, नेत्र आदि सब मेरे व्याप्त हैं और सर्वजगत का साक्षी द्रष्टा, श्रोता अर्थात् सर्वकुछ सर्वरूप मैं ही हूँ ॥२१४॥ 
बालखिल्य डूबत गहै, कर भुज साठ हजार । 
बेर लिये शबरी दिये, अंगद को नग धार ॥ 
दृष्टान्त -
*(१)* क्रतु मुनि के साठ हजार पुत्र थे, उन का नाम बालखिल ऋषि था । उनका शरीर अंगुष्ठ प्रमाण वर्णन किया गया है । वह समुद्र की तीर पर सन्ध्या कर रहे थे । जब समुद्र की तरंग आई, उसमें सब डूब गए । परमेश्वर को आर्तस्वर से पुकारा । परमेश्वर ने साठ हजार भुजा बना कर समुद्र से निकाल कर तीर पर खड़े कर दिए ।
*(२)* जब राम भगवान् अरण्य वन में शबरी आश्रम के नजदीक पहुँचे तब शबरी को बेर - वृक्ष पर बेर तोड़ती हुई देखा । भगवान् उसकी परीक्षा के लिए एक भील का रूप बनाकर बेर के वृक्ष के नीचे आकर खड़े हो गए और शबरी की तरफ ऊपर देखा । शबरी ने भी भील की तरफ देखा । भील रूप में बोले - "नीचे उतर ।" शबरी उतरी । तब बोले - एक अंजली भर बेर मुझे दे दो । मैं भूखा हूँ । शबरी बोली - ऊपर चढ़ के खा ले । भील रूप में बोले - नहीं, तूँ ही दे मुझे । भगवान् के बिना भोग लगाए तुझे कैसे दे दूं ? भील बोला - एक डंडा मारूँगा, जब सब भूल जाएगी और बेर मैं ले जाऊँगा । शबरी ने मन में विचार किया कि यह दुष्ट है । एक डंडा इसका मुझे लगेगा, तो मेरी जान निकल जाएगी और मैं भगवान् के दर्शन किए बिना ही मर जाऊँ गी । तब शबरी ने विचार किया कि मेरे गुरुदेव का उपदेश तो मुझे यह है कि भगवान् तो सर्वत्र व्यापक हैं, अपना प्रेम और भाव होना चाहिए । अब मैं यहीं भगवान् को भोग लगा देती हूँ । फिर ये बेर चाहे यह किरात ले जाए, तो मुझे कोई चिन्ता नहीं । यह सोच कर शबरी ने दोनों हाथों से अपनी साड़ी की झोली आकाश में उछाली और बोली - प्रभु ! ये बेर आपके हैं, भोग लगाना । यह कहकर परमेश्वर के प्रेम में बेसुध हो गई । जितने शबरी के बेर थे, उतने ही हाथ बनाकर प्रभु ने अपने भक्त के दिए हुए बेरों को अधर झेलकर भक्षण कर लिया । जब शबरी को होश हुआ, न बेर मिले और न भील का ही पता चला । फिर भगवान् को भोग के लिए बेर तोड़ने लग गई । लक्ष्मण के सहित राम भगवान् शबरी की परीक्षा करके, फिर शबरी को आते दिखाई दिए ।
*(३)* एक राजा था । उनका छोटा भाई अंगद था । वह शूरवीर भी था । उसको सेना देकर युद्ध के लिए भेजा । उसकी युद्ध में विजय हुई । उसके बाद उस नगर को सैनिक लूटने लगे । अंगद के भी लूट में वहाँ के राजा का एक मुकुट हाथ लग गया । उस मुकुट में एक सौ एक हीरे जड़े हुए थे । जब वे विजय करके राज में आए, तब राजा ने सुना कि इनके पास हीरों का एक बड़ा मुकुट है । लूट में ये लाए हैं । राजा ने इनको बुलाया और कहने लगे - अंगद, वह सौ हीरे तूँ रख ले और एक जो इनमें बड़ा हीरा है, वह हमको दे दे । अंगद बोला - लूट का माल तो जो लूटता है, उसी का हुआ करता है । राजा बोला - मेरा हुकम मान कर मुझे देओ, नहीं तो मैं तुमसे जबरदस्ती छीन लूंगा । अंगद ने कुछ जवाब नहीं दिया । परन्तु राजा हीरे के लिए कुछ न कुछ चेष्टा करता ही रहा । यह अंगद पहले बहुत प्रमादी और विषयी था, परन्तु इसकी स्त्री बड़ी पतिव्रता देवी थी । एक रोज इस स्त्री के उपदेष्टा घर आ गए और यह उनके पास बैठी सत्संग कर रही थी । अंगद अचानक घर आ पहुँचा और स्त्री और उपदेष्टा को एक जगह बैठा देखकर क्रोधित हो गया और बोला - "आप मेरे घर से चले जाओ । आप मेरे घर में मेरी बिना इजाजत के कैसे आ गए ?" वे उठकर चले गए । किसी अन्य भक्त के घर पर जाकर ठहर गए । अंगद की स्त्री को विचार हुआ - "है तो मेरा पति, लेकिन इसका कल्याण किस प्रकार होगा ?" यह सोचकर उसने अन्न - जल त्याग दिया । दो रोज के बाद अंगद को पता चला कि यह कुछ भी नहीं खाती - पीती है । तब बोला - आपको क्या तकलीफ है, बताओ ? मैं वहीं करूँगा जिससे कि तुम्हें सुख प्राप्त होवे । स्त्री बोली कि मैं तो यह चाहती हूँ कि मेरे जो उपदेष्टा गुरु थे, उनका आपने तिरस्कार किया है, उनको आप मना कर लाओ और उनके सत्संग द्वारा आप अपना कल्याण करो, तब मैं सुखी हो सकती हूँ । जहाँ गुरु ठहरे थे अंगद वहाँ गए । उनको नमस्कार किया और अपने घर ले आये और क्षमा याचना की । संत ने ईश्वर भक्ति का उपदेश दिया । फिर वह ईश्वर का सच्चा भक्त बन गया । दोनों स्त्री - पुरूष परमेश्वर की भक्ति में निमग्न रहते थे । एक रोज राजा की कुचेष्टा देखकर अंगद ने विचार किया कि जब तक हीरा मेरे पास रहेगा, झगड़ा ही चलेगा । मैं इसे जगन्नाथ भगवान् के चढ़ा दूँ । तब घर से चल पड़े । राजा को पता चला कि अगंद हीरा जगन्नाथ के चढ़ाने जा रहा है । राजा ने सेना को आज्ञा दी कि अंगद को रास्ते में पकड़ लो और उससे हीरा छीन लो, नहीं दे तो उसे मार दो और हीरा ले आओ । सेना ने अंगद को एक तालाब के किनारे रोक लिया और बोले - हीरा दे दो, नहीं तो तुम्हें अपनी जान का खतरा है । अंगद बोला, भाई ! मैने आज स्नान नहीं किया है । मैं पहले तालाब में स्नान कर लूं फिर हीरा दे दूँगा । यह कहकर तालाब में घुस गया और कमर - कमर जल में जा खड़ा हुआ । हीरा निकाला और सबको दिखाया कि यही हीरा है, जिसके लिए तुम मुझे मारने को खड़े हो ! सबने कहा, यही है । अंगद ने आँख बन्द कर परमेश्वर का ध्यान किया और मन में बोला कि हे नाथ ! यह हीरा आपका है, मैं आपके चढा चुका हूँ, आप इसको ग्रहण करना । यह कहकर जल में डाल दिया । भगवान् उस हीरे को ले गए और अपने मस्तक में धारण कर लिया । कहते हैं - 
नील चक्र पर ध्वजा बिराजै, मस्तक सोहे हीरा । 
ठाकुर आगे दासी नाचे, गावे दास कबीरा ॥ 
अंगद बाहर आ गए और अपने घर चले आए । सेना ने राजा को पूर्वोक्त समाचार सुना दिए । राजा मन में पश्चात्ताप करने लगा । भाई से बैर हो गया और हीरा भी मुझे नहीं मिला । इस प्रकार भक्तों की पुकार भगवान् सर्वत्र सुनते हैं और उनकी इच्छा पूरी करते हैं ।
*सबै दिसा पग सीस हैं, सबै दिसा मन चैन ।*
*सबै दिसा सन्मुख रहै, सबै दिसा अंग अैन ॥२१५॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! सब दिशाओं में मेरे पैर और शीश व्यापक हैं । सब दिशाओं में मेरा ही चैन कहिए, चैतन्य स्वरूप व सुखरूप मन सन्मुख रहता है, इस प्रकार से सब दिशाओं में, मैं साक्षात्कार परमेश्वर ही व्यापक हूँ अथवा हे जिज्ञासुओं ! सतगुरुदेव कहते हैं कि भगवान् सर्वत्र व्यापक है ॥२१५॥ 
"सर्वतः पाणिपादं तत्सर्वतोSक्षिशिरोमुखम् । 
सर्वतः श्रुतिमल्लोके सर्वभावृत्य तिष्ठति ॥"
(क्रमशः)

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