॥दादूराम सत्यराम॥
*"श्री दादूदयाल वाणी(आत्म-दर्शन)"*
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज
.
*= परिचय का अंग - ४ =*
.
*दादू देही मांहि दोइ दिल, इक खाकी इक नूर ।*
*खाकी दिल सूझै नहीं, नूरी मंझि हजूर ॥२२७॥*
टीका - हे जिज्ञासुओं ! शरीर में दो दिल, एक खाकी और एक नूरी है । "खाकी दिल" मलिन अन्तःकरण और "नूरी" शुद्ध अन्तःकरण । जीवात्मा के अन्तःकरण में ही परमेश्वर का वास है, किन्तु मलिन अन्तःकरण होने से संसारीजनों को परमात्मा के स्वरूप का प्रत्यक्ष ज्ञान नहीं होता और जो शुद्ध अन्तःकरण है, उसमें परमेश्वर का प्रत्यक्ष ज्ञान होता है ॥२२७॥
मनो हि द्विविधं प्रोक्तं, अशुद्धं शुद्धमेव च ।
अशुद्धं कामसंकल्पं, शुद्धं काम - विवर्जितम् ॥
मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः ।
बंधाय विषयासक्तं, मुक्तं निर्विषयं स्मृतः ॥
मनहर
दादूजी दयाल को जु पूछी शाह अकबर,
मोकूं मोला दीसै नांहीं, आपको ही भासना ।
कही दादू गुरुदेव "देही मांही दोय दिल,
एक खाकी नूरी दूजो, तोकूं वाकी प्यास ना" ॥
"मोकूं कैसे मिले प्रभु ?"
गुरु कही,
निश्चे धर नासै तेरी वासना,
जु नासै जम सासना ।
छोड़ देहु जग यह पकर काहे कूं राख्यो,
जैसे दाख्यो दादूदेव, दिल में उदास ना ॥
चौ. -
"पहली प्रीति देह सूं तोरे ।
जाके लिये जगत सूं जोरे ॥
छाडे तीन लोक की आसा ।
निश्चय करे ब्रह्म प्रकासा ॥"
.
*नमाज सिजदा*
*दादू हौज हजूरी दिल ही भीतरि, गुसल हमारा सारं ।*
*उजू साजि अलह के आगे, तहाँ नमाज गुजारं ॥२२८॥*
टीका - हे जिज्ञासुओं ! हजूरी के लिएशुद्ध हृदय ही जल का हौद है, उस हौद में राम - नाम रूपी जल भरा है । इसी में भक्तजनों का सार स्नान होता है । फिर पंच ज्ञानेन्द्रियों को बहिर्मुख से अन्तर्मुख करना ही "उजू" है । इस प्रकार परमेश्वर के सामने नमाज गुजारो कहिए, प्रार्थना करो ॥२२८॥
.
*दादू काया मसीत कर पंच जमाती, मन ही मुल्ला इमामं ।*
*आप अलेख इलाही आगे, तहँ सिजदा करे सलामं ॥२२९॥*
टीका - हे जिज्ञासुओं ! यह स्थूल शरीर ही मस्जिद है । जिसमें पांच ज्ञान इन्द्रियाँ ही जमाति हैं और शुद्ध मन ही अगुआ(मार्ग प्रदर्शक) मुल्ला है । इन सब साधनों सहित आप जीवात्माओं को अलेख स्वरूपी परमेश्वर के समक्ष प्रार्थना और नमस्कार करनी चाहिये । यही सच्ची नमाज है ॥२२९॥
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें