मंगलवार, 11 दिसंबर 2012

= परिचय का अंग =(४/२२४-६)

॥दादूराम सत्यराम॥
*"श्री दादूदयाल वाणी(आत्म-दर्शन)"* 
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी 
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज 
*= परिचय का अंग - ४ =* 
दादू नूरी दिल अरवाह का, तहाँ निरंजन वासं ।
तहँ जन तेरा एक पग, तेज पुंज प्रकाशं ॥२२४॥ 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! पवित्र अन्तःकरण में ही निरंजन देव का वास है । इसलिए अपने - अपने अन्तःकरण में ही मनोवृत्ति को एक पग, एक रस करके परमात्मा के तेज - पुंज प्रकाश का दर्शन करिये ॥२२४॥ 
स्वशरीरे स्वयं ज्योतिः स्वरूपं सर्वसाक्षिणम् ।
क्षीणदोषाः प्रपश्यन्ति नेतरे माययावृत्ताः ॥ 
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दादू तेज कमल दिल नूर का, तहाँ राम रहमानं ।
तहँ कर सेवा बंदगी, जे तूँ चतुर सयानं ॥२२५॥ 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! हिन्दू तो तेजोमय कमल रूप हृदय में परमेश्वर का वास कहते हैं और मुसलमान उसी तेजोमय हृदय को नूरी दिल कहकर अल्लह का स्थान मानते हैं । इसलिए अपने हृदय में ही परमात्मा की सेवा और बंदगी करिये । इसी से बुद्धि व विवेक की सफलता है ॥२२५॥ 
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तहाँ हजूरी बंदगी, नूरी दिल में होइ ।
तहँ दादू सिजदा करै, जहाँ न देखै कोइ ॥२२६॥ 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! "हजूरी" जो बंदा कहिए, सेवक शुद्ध हृदय में उस परमेश्वर की भक्ति रूप सेवा करे, वहीं पर परमेश्वर की "सिजदा" कहिए, नमाज गुजारे । वहाँ बहिर्मुख कोई भी नहीं पहुँचता ॥२२६॥
(क्रमशः)

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