॥दादूराम सत्यराम॥
*"श्री दादूदयाल वाणी(आत्म-दर्शन)"*
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज
.
*= परिचय का अंग - ४ =*
.
*इश्क सलूनां आशिकां, दरगह तैं दीया ।*
*दर्द मोहब्बत प्रेम रस, प्याला भर पीया ॥२३९॥*
टीका - हे जिज्ञासुओं ! प्रभु ने कृपा करके भक्तों को स्वस्वरूप से अति उत्तम प्रेम दिया है । भक्तजन विरहभाव के दर्द से परमेश्वर के दर्शनामृत रूप को प्रेम प्याले में भर - भर कर पीते हैं ॥२३९॥
(शब्दार्थ - आशिकां = भक्तों को । दरगह = स्वस्वरूप । सलूनां = अति सुन्दर)
.
*दादू दिल दीदार दे, मतवाला कीया ।*
*जहाँ अर्श इलाही आप था, अपना कर लीया ॥२४०॥*
टीका - हे जिज्ञासुओं ! परमेश्वर अपने भक्तों को दर्शनमय प्रेम - रस का प्याला पिला कर मस्त करते हैं और जहाँ हृदय में इलाही परमेश्वर आप विराजमान हैं, उस स्थान में भक्तजन, अपनी वृत्ति स्थिर करके दत्तचित्त हो रहे हैं ॥२४०॥
.
*दादू प्याला नूर दा, आशिक अर्श पीवन्न ।*
*अट्ठे पहर अल्लह दा, मुँह दिट्ठे जीवन्न ॥२४१॥*
टीका - हे जिज्ञासुओं ! आशिक कहिए परमेश्वर के प्रेमी भक्तजन, परमात्मा के स्वस्वरूप का दर्शनरूप प्रेम का प्याला हृदयरूपी आकाश में पीते हैं और वे आठों पहर परमेश्वर के मुखारविन्द का दर्शन करके जीते हैं ॥२४१॥
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें