रविवार, 30 दिसंबर 2012

= परिचय का अंग =(४/३२१-२३)


॥दादूराम सत्यराम॥
*"श्री दादूदयाल वाणी(आत्म-दर्शन)"* 
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी 
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज 
*= परिचय का अंग - ४ =*
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*जैसे नैना दोइ हैं, ऐसे होंहि अनंत ।*
*दादू चंद चकोर ज्यों, रस पीवैं भगवंत ॥३२१॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! जैसे इस शरीर में दो नेत्र हैं, ऐसे अनेक नेत्र रोम - रोम में हो जावें, तो भक्तजन परमात्मा का अतृप्तभाव से दर्शनरूपी अमृत पान करें । जैसे चन्द्रमा का दर्शन करके चकोर अतृप्त रहता है, दर्शन की इच्छा बनी ही रहती है, वैसे ही भक्तों को परमेश्वर के दर्शन की इच्छा बनी रहती है ॥३२१॥ 
साजन दीन्हों हे सखी ! दर्शन सर्वस लोइ । 
मो मन नैन कुपात्र ज्यूं, तृप्ति न मानै कोइ ॥ 
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*ज्यों रसना मुख एक है, ऐसे होंहि अनेक ।*
*तो रस पीवै शेष ज्यों, यों मुख मीठा एक ॥३२२॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! जैसे शेष जी के एक सहस्त्र मुख हैं और उनमें दो सहस्त्र जिह्वा हैं, वैसे ही हमारा रोम - रोम भी जिह्वा रूप होकर भगवान् के गुण - कीर्तन में लयलीन हो तो हम प्रभु की भक्ति पावें, तभी हमारा मुख मीठा होवे ॥३२२॥ 
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*ज्यों घट आत्म एक है, ऐसे होंहि असंख ।*
*भर भर राखै रामरस, दादू एकै अंक ॥३२३॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! जिस प्रकार हमारा यह पंच भौतिक शरीर असंख्य रूप होकर असंख्य मुख, नेत्र, श्रोत्र आदि इन्द्रियों सहित राम - रस अमृत पान करे, तभी राम से अभेद होवे ॥३२३॥
(क्रमशः)

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