रविवार, 16 दिसंबर 2012

= परिचय का अंग =(४/२४२-४)


॥दादूराम सत्यराम॥
*"श्री दादूदयाल वाणी(आत्म-दर्शन)"* 
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी 
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज 
*= परिचय का अंग - ४ =* 
.
*आशिक अमली साधु सब, अलख दरीबे जाइ ।*
*साहिब दर दीदार में, सब मिल बैठे आइ ॥२४२॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! परमात्मा(अलख) के प्रेमी नाम - स्मरणरूपी अमल को करने वाले, बहिर्मुख से हृदयरूपी दरबार(दरीबा) में स्थित होकर परमात्मा का साक्षात्कार करके, उसमें अभेद होकर स्थित रहते हैं ॥२४२॥ 
गुरु दादू आमेर में, डहरे माधवदास । 
भेजी भेंट जुवार की, अलख दरीबे पास ॥ 
दृष्टान्त - ब्रह्मऋषि दादू दयाल जी महाराज आमेर में निवास करते थे । महाराज के शिष्य माधोदास जी डेरा ग्राम में निवास करते थे । वहाँ के काश्तकार ज्वार के सिट्टे, माधोदास जी महाराज के पास लाए । महाराज की आज्ञा से फिर उनको सेक कर उनके दाने निकाले । एक थाल में भरकर चौकी पर रखे । महाराज माधोदास जी ने विचार किया कि पहले नये अन्न का गुरुदेव के भोग लगना चाहिए । यह विचार कर थाल पर एक कपड़ा डाला और अपनी योगशक्ति से चौकी के सहित थाल को आमेर अलख दरीबे गुरुदेव के दरबार में भेज दिया । राजा मानसिंह के सहित परमगुरुदेव बिराज रहे थे । राजा ने देखा, यह अचानक चौकी कहाँ से आकर रखी गई । कोई ले कर आने वाला दिखलाई नहीं पड़ा । मानसिंह ने गुरुदेव से प्रश्न किया कि यह थाल कहाँ से आया और इसमें क्या है ? गुरुदेव बोले - माधोदास जी ने ज्वार का भोग भेजा है । महाराज ने भोग लगाया और एक - एक मुट्ठी राजा के सहित सब को दिया । फिर अपनी योगशक्ति से उस थाल को वैसे ही डेरा भेज दिया । महाराज माधोदास जी ने स्वयं प्रसाद लिया और सभी भक्तों को एक - एक मुट्ठी बाँट दिया । अलख के दरबार(सत्संग) में सभी भक्तजन मिल कर प्रेम रस पीते हैं और अलख का प्रसाद पाते हैं ।
लाहौर शाह हुसेनजी, एक जुलाहा और । 
इत ही हो उत तो नहीं, बाल दिखाया और ॥ 
द्वितीय दृष्टान्त - हुसेनशाह और एक जुलाहा दोनों लाहौर में एक ही जगह रहते थे । जुलाहा प्रतिदिन सुरति रूप से मक्का जाया करता था । एक दिन जुलाहे ने हुसेनशाह से कहा - आप मक्का क्यों नहीं जाते ? यहाँ ही रहते हो । हुसेन शाह बोले - जाता कैसे नहीं ? तुम्हारे साथ रोज तो जाता हूँ । जुलाहा - मक्का में मैंने तो आपको कभी देखा नहीं । दूसरे दिन जब दोनों नमाज में बैठे थे, तो हुसेन शाह ने जुलाहे के सिर का एक बाल उखाड़ लिया तो जुलाहे ने बाल उखाड़ने वाले फकीर से पूछा कि तुमने बाल क्यों उखाड़ा ? फकीर बोला - क्योंकि अपना अजीज, मोअज्जिज व मोमिन हमराही इकबाल कराने के मकसद से मैंने सबूत के तौर पर यह तुम्हारा बाल लिया है । उम्मीद है, तुम बुरा नहीं मानोगे ।
दूसरे दिन लाहौर में सुबह के वक्त हुसेन शाह ने जुलाहे को बाल दिखाकर कहा - देख, यह बाल वही है, जिसे कल मक्का में नमाज के वक्त किसी ने तुम्हारे सिर से उखाड़ा था ? जुलाहा - हाँ, वही है । हुसेन शाह - मैंने ही उखाड़ा था । अब तो मान गये ना, मैं भी मक्का शरीफ रोज जाता हूँ ।
ऐसे ही प्रभु के सत्संग दरबार में सब प्रेमी संत बैठकर प्रभु का साक्षात्कार करते हैं । उच्च कोटि के संत तो सुरति रूप शरीर से ही प्रभु का साक्षात् दर्शन करते हैं ।
.
*राते माते प्रेम रस, भर भर देहु खुदाइ ।*
*मस्तान मालिक कर लिये, दादू रहे ल्यौ लाइ ॥२४३॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! स्वयं भगवान् ही अपने भक्तों को अपने प्रेम - रस का प्याला भर - भर कर देते हैं, जिससे भक्तजन प्रेम - रस में रत होकर मस्त हो रहे हैं । इस प्रकार प्रभु ने अपने स्वरूप में संतों को निर्भय किया है । इसी से संतजन परमेश्वर में ही लीन रहते हैं ॥२४३॥ 
.
*लांबी भक्ति अगाध*
*दादू भक्ति निरंजन राम की, अविचल अविनाशी ।*
*सदा सजीवन आतमा, सहजैं परकाशी ॥२४४॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! परमात्मा की अविचल, अविनाशी जो भक्ति है, वह सतगुरु की कृपा से जीवात्मा के अन्तःकरण में प्रकट होती है । जिससे यह जीवात्मा सहज ही में सदा सजीवन, अजर, अमर भाव को प्राप्त होता है ॥२४४॥ 
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें