रविवार, 16 दिसंबर 2012

= परिचय का अंग =(४/२४५-७)

॥दादूराम सत्यराम॥
*"श्री दादूदयाल वाणी(आत्म-दर्शन)"* 
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी 
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज 
*= परिचय का अंग - ४ =*
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*दादू जैसा राम अपार है, तैसी भक्ति अगाध ।*
*इन दोनों की मित नहीं, सकल पुकारैं साध ॥२४५॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! जैसे भगवान का स्वरूप अपार है, वैसे ही उनकी भक्ति भी अगाध है, जिस भक्ति का कोई पार नहीं पाता है । परमेश्वर और उनकी भक्ति का कोई "मित" कहिए प्रमाण नहीं है । सर्व साधु संत(भूत, वर्तमान और भविष्य के) ऐसा ही उपदेश करते हैं ॥२४५॥ 
*दादू जैसा अविगत राम है, तैसी भक्ति अलेख ।*
*इन दोनों की मित नहीं, सहस मुखां कहै शेष ॥२४६॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! जैसे परमात्मा मन बुद्धि से अविगत कहिए, जानने में नहीं आते हैं वैसे ही भक्ति की महिमा भी अपार है जो कि मन इन्द्रियों से नहीं वर्णन होती है । भगवान् और भक्ति, दोनों का कोई भी "मित" कहिए परिमाण नहीं है । यद्यपि शेष जी महाराज भी एक हजार मुख और दो हजार जिह्वाओं से परमात्मा की महिमा गाते हैं, तथापि भगवान् और भक्ति का पार नहीं पाते हैं ॥२४६॥ 
भगवत अरु भगवद् भजन, इनका नाहीं अन्त । 
ऐसे ही जन की लगन, "जगन्नाथ" अनन्त ॥ 
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*दादू जैसा निर्गुण राम है, तैसी भक्ति निरंजन जाणि ।*
*इन दोनों की मित नहीं, संत कहैं परमाणि ॥२४७॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! जैसे भगवान् माया आवरण से शून्य और निर्गुण स्वरूप है, वैसे ही भगवान् की भक्ति भी "निरंजन" नाम निर्मल है । प्रामाणिक संतजन, नारद, सनकादिक आदि, इस प्रकार उपदेश करते हैं कि इस संसार में भगवान् और भक्ति, ये दोनों ही अमूल्य रत्न हैं ॥२४७॥ 
(क्रमशः)

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