सोमवार, 17 दिसंबर 2012

= परिचय का अंग =(४/२४८-५०)

॥दादूराम सत्यराम॥
*"श्री दादूदयाल वाणी(आत्म-दर्शन)"* 
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी 
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज 
*= परिचय का अंग - ४ =*
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*दादू जैसा पूरा राम है, तैसी पूरण भक्ति समान ।*
*इन दोनों की मित नहीं, दादू नांही आन ॥२४८॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! जैसे सर्वव्यापक ब्रह्म है, वैसे ही राम की भक्ति भी पूर्ण अक्षय है । अतः इन दोनों का मूल्य नहीं है, क्योंकि इनके समान संसार में कोई भी अमूल्य पदार्थ नहीं है ॥२४८॥ 
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*सेवा अखंडित*
*दादू जब लग राम है, तब लग सेवक होइ ।*
*अखंडित सेवा एक रस, दादू सेवक सोइ ॥२४९॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! जैसे परमेश्वर अखंड और एकरस हैं, वैसे ही भक्त भी परमेश्वर में अखंड लय लगाकर और एकरस निद्र्वन्द्व भाव होकर परमेश्वर की अखंडित, एकरस निर्गुण उपासना रूप सेवा करने वाला ही होता है ॥२४९॥ 
छन्द - 
जो उपजै बिनसै गुन धारत, 
तो यह जानहु अंजन माया । 
आव न जाय मरै नहिं जीवत, 
अच्युत एक निरंजन राया ॥ 
ज्यूं तरु तत्व रहे रस एक ही, 
आवत जाय फिरे यह छाया । 
सो परब्रह्म सदा सिर ऊपर, 
सुन्दर ता प्रभु सूं मन लाया ॥ 
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*दादू जैसा राम है, तैसी सेवा जाणि ।*
*पावेगा तब करेगा, दादू सो परमाणि ॥२५०॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! जैसे परमेश्वर सर्वशक्तिमान है, वैसे ही भक्त की भक्ति भी सर्वशक्तिमय है । भक्ति को ही भगवान् का स्वरूप जानो और भगवान् जब कृपा करके अपनी भक्ति देते हैं, तब ही भक्त को भक्ति प्राप्त होती है । फिर भक्त, भक्ति रस में लयलीन होकर प्रभु का चिन्तन करता है और तो सभी विषयरस को ही भोगते हैं । इसलिए हे जिज्ञासुओं ! परमेश्वर की भक्ति करके ही स्वस्वरूप का साक्षात्कार करो ॥२५०॥
(क्रमशः)

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