॥दादूराम सत्यराम॥
*"श्री दादूदयाल वाणी(आत्म-दर्शन)"*
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज
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*= परिचय का अंग - ४ =*
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*सांई सरीखा सुमिरण कीजे, सांई सरीखा गावै ।*
*सांई सरीखी सेवा कीजे, तब सेवक सुख पावै ॥२५१॥*
टीका - हे जिज्ञासुओं ! भक्तजन परमेश्वर की भक्ति में ऐसे तल्लीन रहते हैं कि परमेश्वर रूप होकर भी प्रभु के स्मरण में लगे रहते हैं, परमेश्वर को प्राप्त करके भी भक्ति अमृत से कभी तृप्त नहीं होते हैं । वैसे ही परमेश्वर में अभेद होकर परमेश्वर का स्मरण करो । जैसे परमेश्वर अखंड, अजन्मा, अगोचर और असंग है, वैसा ही विषयों से विरक्त होकर परमेश्वर की भक्ति करो । फिर तुम परमात्मा के सच्चे सेवक बनकर परमानन्द को प्राप्त होओगे ॥२५१॥
सेवा तोलौं कीजिये, जोलौं सिरजनहार ।
ना वह खपै न वह थकै, कबीर सेवक सार ॥
जोलौं हरि तोलौं करै, भक्ति भक्तजन सोइ ।
वाको ओर न वह थकै, "जगन्नाथ" सम दोइ ॥
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*परिचय करुणा विनती*
*दादू सेवग सेवा कर डरै, हम थैं कछु न होइ ।*
*तूँ है तैसी बन्दगी, कर नहिं जाणै कोइ ॥२५२॥*
टीका - हे जिज्ञासुओं ! जैसे अपूर्व, अनन्त, एकरस आप परमेश्वर का स्वरूप है, वैसी सेवा हे प्रभु ! आपके भक्तों से नहीं होती है । इसी से आपके भक्ति - रस का पान करते हुए भी आपके भक्तों को संतोंष नहीं होता है और भय हमारे चित्त में हमेशा बना रहता है कि हमने यह मनुष्य शरीर प्राप्त करके भी अपने प्रभु की यथायोग्य सेवा नहीं की ॥२५२॥
डर सेवा डर कर्म गति, डर करणी में सार ।
"खोजी' डरै सु ऊबरै, गाफिल खाई मार ॥
"खोजी' डरै सु ऊबरै, गाफिल खाई मार ॥
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*दादू जे साहिब मानै नहीं, तऊ न छाडूं सेव ।*
*इहि अवलंबन जीजिये, साहिब अलख अभेव ॥२५३॥*
टीका - हे जिज्ञासुओं ! यदि परमेश्वर हमारी सेवारूप भक्ति को न स्वीकार करे, तो भी परमेश्वर से विमुख नहीं होना चाहिए और अपने हृदय में यही दृढ़ विश्वास रखो कि परमेश्वर का स्वरूप अलख, मनवाणी का अविषय है और वे अन्तर्यामी हैं । सबके हृदय के भाव को जानते हैं । हे संतों ! ऐसा निश्चय करके परमेश्वर के स्मरण में तन्मय होकर लगे रहो ॥२५३॥
(क्रमशः)

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