॥दादूराम सत्यराम॥
*"श्री दादूदयाल वाणी(आत्म-दर्शन)"*
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज
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*= परिचय का अंग - ४ =*
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*सूक्ष्म सौंज अरचा बन्दगी*
*आदि अंति आगे रहे, एक अनुपम देव ।*
*निराकार निज निर्मला, कोई न जाणे भेव ॥२५४॥*
टीका - हे जिज्ञासुओं ! जिस परमेश्वर का न तो आदि है, न अन्त है और वह उपमा आदि भाव से भी रहित है, वह परमेश्वर माया - मल से रहित निराकार, निर्लेप, शुद्ध चैतन्य है । इसीलिए उसका यथार्थ ज्ञान द्वैतवादी कोई भी नहीं जानते हैं ॥२५४॥
रामचन्द्र बालक थकां, काकभुशंडि ले सींत ।
भाज्यो जहँ तहँ लार कर, तबही भई प्रतीत ॥
दृष्टान्त - रामचन्द्रजी जब बालक थे, तब काकभुशुंडि ने सोचा - यह रामचन्द्र मेरे इष्टदेव राम ही हैं या साधारण बालक ? इनकी परीक्षा करनी चाहिये । फिर एक दिन राजा दशरथ के महल में पहुँच गये । वहाँ रामचन्द्रजी को हाथ में रोटी का टुकड़ा लिये आंगन में देखा तो रोटी का टुकड़ा छीनकर उड़ गये, किन्तु पीछे देखा तो रामचन्द्रजी का हाथ उनको पकड़ने के लिये पीछे आ रहा है । वे अति वेग से उड़े, किन्तु वे जहाँ भी गये, वहाँ ही रामचन्द्रजी का हाथ पीछे आता दिखाई दिया । अन्त में भयभीत होकर वे रामचन्द्रजी का स्तुतिगान करने लगे - आप तो सबमें रमने वाले साक्षात् राम ही है, आपका पार कोई नहीं पा सकता है । आप ही निराकार निर्मल ब्रह्म हैं, यही जानने के लिये मैंने ऐसा किया था । मुझे क्षमा कीजिये, दयालो ! ऐसा कहते ही हाथ अदृश्य हो गया ।
(सींत = सीथ, पका हुआ भोजन, भोग, प्रसाद, नैवेद्य ।)
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*अविनासी अपरंपरा, वार वार नहीं छेव ।*
*सो तूँ दादू देखि ले, उर अंतर कर सेव ॥२५५॥*
टीका - हे जिज्ञासुओं ! वह परमेश्वर अपरंपार कहिए कार्य - कारण भाव से रहित है, इसीलिये वह अविनाशी है और जन्म - मरण भाव से मुक्त है । हे संतों ! ऐसे अपरम्पार को भक्ति - साधन से अपने हृदय में अनुभव करो ॥२५५॥
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*दादू भीतर पैसि कर, घट के जड़े कपाट ।*
*सांई की सेवा करै, दादू अविगत घाट ॥२५६॥*
टीका - हे जिज्ञासुओं ! अन्तर्मुख होकर शरीर के इन्द्रिय रूप कपाट बन्द कर लो । जब इन्द्रियां अपने - अपने विषयों को छोड़कर अन्तःकरण में ही परमेश्वर की भक्ति में लीन हो जावें, तो अविगत कहिए, परमेश्वर की प्राप्ति के इस मार्ग को प्राप्त कर लेती हैं ॥२५६॥
(क्रमशः)

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