मंगलवार, 18 दिसंबर 2012

= परिचय का अंग =(४/२५७-९)


॥दादूराम सत्यराम॥
*"श्री दादूदयाल वाणी(आत्म-दर्शन)"* 
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी 
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज 
*= परिचय का अंग - ४ =*
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*घट परिचै सेवा करै, प्रत्यक्ष देखै देव ।*
*अविनाशी दर्शन करै, दादू पूरी सेव ॥२५७॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! अपने अन्तःकरण में ही परमात्मा से जीवात्मा परिचय होकर उसकी भक्ति रूप सेवा करे, तो फिर अपने भीतर ही उस अविनाशी परमेश्वर का साक्षात्कार करके मनुष्य देह के कर्तव्य को पूरा करना ही उसकी सच्ची सेवा है ॥२५७॥ 
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*भ्रम विध्वंस*
*पूजनहारे पास हैं, देही मांहैं देव ।*
*दादू ताकौं छाड़ कर, बाहर मांडी सेव ॥२५८॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! भक्ति करने वाले भक्तों के हृदय में ही परमेश्वर है । भक्त लोग वहीं पर परमेश्वर की अभेद निश्चयरूप पूजा करते रहते हैं । परन्तु बहिर्मुखी संसारीजन सकाम कर्मों के द्वारा परमेश्वर को हृदय में न जानकर, "बाहर" कहिए मन्दिर, मस्जिद, तीर्थ, व्रत आदि में परमेश्वर को देखकर उसकी आराधना रूप सेवा करते हैं । वे आत्मस्वरूप परमेश्वर से विमुख ही रहते हैं ॥२५८॥ 
ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेSर्जुन तिष्ठति ।
भ्रामयन् सर्वभूतानि यन्त्रारूढ़ानि मायया । 
(गीता)
"सन्तं समींप रमणं रतिप्रदं, 
वित्तप्रदं नित्यमिमं विहाय । 
अकामदं दुःखभयाधिशोकं 
मोहप्रदं तुच्छमहं भजेSज्ञः ॥" 
(भागवत) 
*परिचय*
*दादू रमता राम सौं, खेलें अन्तर मांहि ।*
*उलट समाना आप में, सो सुख कतहुँ नांहि ॥२५९॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! जो मुक्त पुरुष सर्वव्यापक राम से अपने अन्तःकरण में ही "खेलें" कहिए स्वस्वरूप का अनुभव करते हैं, वे ही धन्य हैं, क्योंकि अपनी मनोवृत्ति को इन्द्रियों के विषय - व्यापार से अन्तर्मुख करके स्वस्वरूप में स्थिर होने के समान परम आनन्द त्रिलोकी में अन्यत्र कहीं भी नहीं है ॥२५९॥ 
"रमन्ते योगिनो यस्मिन् नित्यानन्दे चिदात्मनि । 
इति राम पदेनासौ परब्रह्माभिधीयते ॥"
निर संतार मिल राग ह्वै, मधुर चुरावत चित्त । 
शंकर सो सुख किम कहूँ, मिलत जु मित्त हि मित्त ॥
(क्रमशः)

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