॥दादूराम सत्यराम॥
*"श्री दादूदयाल वाणी(आत्म-दर्शन)"*
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज
.
*= परिचय का अंग - ४ =*
.
*दादू जे जन बेधे प्रीति सौं, सो जन सदा सजीव ।*
*उलट समाने आप में, अंतर नांही पीव ॥२६०॥*
टीका - हे जिज्ञासुओं ! सतगुरु कृपा से जो पुरुष परमेश्वर प्रेम में अभेद हो गये, सो अजर - अमर भाव को प्राप्त होते हैं, क्योंकि जब इन्द्रियाँ विषय - विकार व्यापार से अन्तर्मुख वृत्ति होकर स्वस्वरूप में अभेद हुई तो फिर भगवान और मुक्त भक्तों में किंचित् भी अन्तर नहीं रहता ॥२६०॥
.
*परगट खेलें पीव सौं, अगम अगोचर ठांव ।*
*एक पलक का देखणा, जीवण मरण का नांव ॥२६१॥*
टीका - हे जिज्ञासुओं ! मुक्त पुरुष शुद्ध अन्तःकरण में अगम, मन का अविषय, इन्द्रियों से अप्राप्त, ऐसे आत्मस्वरूप में अभेद होकर परम आनन्द का अनुभव करते हैं । परमात्मा का एक पल मात्र का जो दर्शन है, सो जन्म से मरण पर्यन्त अखण्ड परमेश्वर - स्मरण का फल स्वयं प्रकटता है, अथवा पलमात्र परमेश्वर के दर्शन मिलते ही फिर तो जन्म - मरण का नाम मात्र ही रह जाता है अर्थात् मुक्तजन अजर - अमर भाव को प्राप्त होते हैं ॥२६१॥
.
*सूक्ष्म सौंज अर्चा बंदगी*
*आत्म मांही राम है, पूजा ताकी होइ ।*
*सेवा वंदन आरती, साध करैं सब कोइ ॥२६२॥*
टीका - हे जिज्ञासुओं ! अपने अन्तःकरण में ही परमेश्वर व्यापक है । आप सब विषय व्यापार को त्यागकर अन्तर्मुख होकर स्वस्वरूप परमेश्वर की आराधना रूप पूजा कीजिये, क्योंकि भूत, भविष्य, वर्तमान के सभी संत अपने आत्मस्वरूप में स्थिर होकर ही परमेश्वर की सेवा रूप वंदना और विचार रूप आरती करते हैं ॥२६२॥
मूल कँवल सो देहुरा, प्राणनाथ सो देव ।
"जगन्नाथ" आतम निकट, कीजे ताकी सेव ॥
"रज्जब" दीपक लाख पर, कोटि ध्वजा आनन्द ।
तो गुरु की कर आरती, जामें है गोविन्द ॥
जड़ मूरति उर नांव बिन, ता पर मंगल चार ।
तो "रज्जब" कर आरती, गुरु पर बारंबार ॥
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें