बुधवार, 19 दिसंबर 2012

= परिचय का अंग =(४/२६३-४)


॥दादूराम सत्यराम॥
*"श्री दादूदयाल वाणी(आत्म-दर्शन)"* 
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी 
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज 
*= परिचय का अंग - ४ =*
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*परिचै सेवा आरती, परिचै भोग लगाइ ।*
*दादू उस प्रसाद की, महिमा कही न जाइ ॥२६३॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! ब्रह्मऋषि अब सेवा की सार्थकता कहते हैं कि परमात्मा का साक्षात्कार होना ही परमेश्वर की सच्ची सेवा और आरती है तथा साक्षात् करना ही मानो भोग लगाना है । इस प्रकार परमेश्वर की प्रसन्नता रूप प्रसाद की अपूर्व महिमा है जो कि कहने में नहीं आती है अथवा ऐसे आत्म - परिचायक संतों के प्रसाद की भी महिमा नहीं कही जा सकती है ॥२६३॥ 
वैष्णवोच्छिष्टशेषं वै पितृणां च दिवोकसाम् । 
सर्वेषां भूसुरादिना भक्तिदं कल्मषापहग् ॥ 
ब्रह्महत्याः सहस्त्राणि, भ्रूणहत्याः शतानि च । 
तासां पापानि नश्यन्ति, वैष्णवोच्छिष्ट भोजनात् ॥ 
लड़की से लड़का भया, लेत प्रसादी सींत । 
राघो भिन्न न कीजिये, पारस रूप अतीत ॥ 
दृष्टान्त - एक लड़की खेत में पक्षी उड़ाती थी । संत घूमते हुए आ गए । लड़की बोली - महाराज सिट्टे फली खाओ । महात्मा बैठ गए । लड़की बाजरे के सिट्टों मे से बाजरा निकाल कर संत को देने लगी । संत परिचै सिद्ध थे । भोग लगाकर पाने लगे । पाते पाते बोले - ले बच्चा तूँ भी खा । लड़की बोली - मैं तो बच्चा नहीं हूँ, बच्ची हूँ । संत बोले - नहीं, तूँ बच्चा है, ले प्रसाद । प्रसाद खाते ही लड़की से लड़का बन गया । यह संत - प्रसाद की महिमा है ।
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*मांहि निरंजन देव है, मांहि सेवा होइ ।*
*मांहि उतारै आरती, दादू सेवक सोइ ॥२६४॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! शरीर के भीतर ही निरंजनदेव विद्यमान है । इसलिए यह शरीर ही मन्दिर है । इसके भीतर ही विचार रूप निरंजनदेव की सेवा करो और स्वस्वरूप का निश्चय करना ही मानो आरती उतारना है, ऐसा करने वाला सेवक ही धन्य है ॥२६४॥ 
नींव बिहूना देहुरा, देह बिंहूना देव । 
"कबीर" तहाँ बिलंबिया, करै अलख की सेव ॥

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