रविवार, 2 दिसंबर 2012

= परिचय का अंग =(४/१७८-८०)

॥ दादूराम-सत्यराम ॥
*"श्री दादूदयाल वाणी(आत्म-दर्शन)"*
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज 
*= परिचय का अंग - ४ =* 
*दादू मन चित सुस्थिर कीजिये, तो नख सिख सुमिरण होइ ।*
*श्रवण नेत्र मुख नासिका, पंचों पूरे सोइ ॥१७८॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! मन और चित्त को स्थिर करिये, तो नख से शिखा पर्यन्त स्मरण होवेगा और श्रवण - नेत्र आदिक पंच इन्द्रियें परमेश्वर में ही पूर्ण संलग्न रहें और मनन चिन्तन द्वारा फिर परमेश्वर में ही संलग्न रहो ॥१७८॥ 
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*साध महिमा*
*आतम आसन राम का, तहाँ बसै भगवान ।*
*दादू दोन्यूं परस्पर, हरि आतम का थान ॥१७९॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! संतों का हृदय राम का आश्रय कहिए, स्थान है, वहाँ परमेश्वर निवास करता है । और जीवात्मा का आश्रय कहिए स्थान परमेश्वर है, क्योंकि दोनों ओत - प्रोत रहते हैं और नाम - स्मरण से ही भक्त, शान्ति को प्राप्त होते हैं तथा स्थिरता रहती है, अन्यत्र कहीं भी शान्ति नहीं है । इस प्रकार मुक्त आत्मा, परमात्मा में अभेद होकर एक रूप होते हैं ॥१७९॥ 
"साधवो हृदयं मह्मं, साधूनां हृदयं त्वहम् ।"
छंद - 
काम ही न क्रोध जाके, लोभ ही न मोह ताके, 
मद ही न, मत्सर न, कोऊ न विकारो है ।
दुःख ही न सुख मानै, पाप ही न पुण्य जानै, 
हरष न सोक आनै, देह ही तैं न्यारो है ॥ 
निन्दा न प्रशंसा करै, राग ही न द्वेष धरै, 
लेन ही न देन जाके, कछू न पसारो है ।
सुन्दर कहत ताकी, अगम अगाध गति, 
ऐसो कोई साधु सो तो, राम जी को प्यारो है ॥ 
दोहा - 
साधु दिल सांई रहै, हरि हिरदा में साध । 
रज्जब महिमा क्या कहूँ, ठाहर उभै अगाध ॥ 
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*राम जपै रुचि साधु को, साधु जपै रुचि राम ।*
*दादू दोनों एक टग, यहु आरम्भ यहु काम ॥१८०॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! भगवान् तो अपने भक्तों का स्मरण करते हैं और साधु भक्तजन प्रेमपूर्वक परमेश्वर के स्मरण में लै लीन रहते हैं । इस प्रकार भगवान् और भक्त परस्पर एकरूप हो रहे हैं । इसलिए संतों का तो यह कार्य है कि वे निरन्तर निष्काम कर्म करें, और भगवान् का यह काम है कि अपने भक्तों का योग - क्षेम करें ॥१८०॥ 
"यः विष्णुः स शिवः प्रोक्तो, यः शिवो विष्णुरेव सः । 
एकमेव स्वरूपं तु द्विविधं परिदृश्यते ॥"
छन्द - 
आठों याम यम नेम, आठों याम रहै प्रेम, 
आठों याम योग यज्ञ, कीयो बहु दान जू ।
आठों याम जप तप, आठों याम लीयो व्रत, 
आठों याम तीर्थ में, करै असनान जू ॥ 
आठों याम पूजा विधि, आठों याम आरती हु, 
आठों याम दंडवत, सुमिरण ध्यान जू ।
सुन्दर कहत जिन, कियो सब आठों याम, 
सोई साधु जाके उर, एक भगवान जू ॥ 
नारद पूछी विष्णु से, आप भजत हो काहि । 
जती सती मम भक्त बली, मोहमरद अति आहि ॥ 
दृष्टान्त - एक समय नारद जी बैकुन्ठ धाम पहुँचे और देखा कि भगवान् आँख बंद करके ध्यान कर रहे हैं । प्रणाम करके बैठ गए । ध्यान से जब उत्थान हुए, तब हाथ जोड़कर पूछा - प्रभु ! आप किसका ध्यान करते थे ? भगवान् बोले - जो जती - सती मुझे भजते हैं, मैं उनको भजता हूँ । नारद जी बोले - इस समय किसको भज रहे थे ? यह मोहमर्द नाम का राजा, उसकी रानी, उसके लड़के की स्त्री, उन्हीं को मैं भज रहा था । नारद जी मृत्युलोक में आए और योग माया से मोहमर्द के राजकुमार को जंगल में आकर्षण करके एक मायावी शेर से उसकी मृत्यु करवा दी । फिर जाकर शहर के दरवाजे पर बैठ गए । रानी ने सुना कि एक संत अलौकिक अमुक जगह बैठे हैं । रानी आई, नमस्कार किया - "प्रभु महल में पधारिये । यह राज और घर आपका ही है ।" नारद संतरूप में यह सुनकर बोले - आपके पुत्र को शेर ने मार दिया, हमें मन में बहुत दुःख है । "मेरा पुत्र नहीं होगा ?" नारद - मैं आपके पुत्र को जानता हूँ ।" मैं नहीं जानती ।" संत - "क्यों ?" 
रानी कहती है, *दृष्टान्त सुनो* - 
एक ब्राह्मण के पुत्र हुआ जंगल में ले जाकर ब्राह्मण ने रख दिया, बोला - तूँ कौन है ? पुत्र बोला - मैं तुम्हारा बोहरा हूँ, कर्जा लेने आया हूँ । इस प्रकार छह पुत्रों ने ब्राह्मण से कर्जा लिया । किसी ने कुछ, किसी ने कुछ दिया हुआ कर्जा मांगा । ब्राह्मण कर्जा चुकाकर बहुत खुश हुआ । वैसे ही कोई कर्जदार होगा । मेरा पुत्र नहीं था । संत बोले - "पुत्रवधू के पास जा रहा हूँ ।" रानी ने आज्ञा दी । पुत्रवधू के महल में पहुँचे । वधू ने आकर चरण - स्पर्श किये और ले जाकर सुन्दर आसन पर बिठाया । संत बोले - तुम्हारा पति मर गया, मैंने देखा है, मुझे बड़ा दुःख है । पुत्रवधू बोली - मेरा पति नहीं होगा । *सुनिये दृष्टान्त* - 
एक नदी बह रही थी । बहुत से लक्कड और लकड़ी बहते जा रहे थे । एक लक्कड के साथ लकड़ी लग गई । बहुत दूर तक साथ मिलकर बहने लगे । एक दिन लक्कड़ आगे निकल गया, लकड़ी पीछे रह गई । आपसे मैं पूछती हूँ, उस लक्कड और लकड़ी को किसने मिलाया ? और उसका वियोग किसने कराया ? संत - पानी ने संयोग और वियोग कराया । पुत्रवधू - महाराज ! वैसे ही यह संसार एक दरियाव है । लक्कड़ और लकड़ी के स्थान में जीव हैं । कर्मरूपी पानी है । कर्म के संयोग से, मैं उसके साथ रही, वह मेरे साथ रहा । आज कर्म ने वियोग करा दिया । इसमें पति और पत्नी कहाँ रह जाता है ? इसलिए मुझको कोई दुःख नहीं है । आप संत हो, कोई सेवा बताओ ? क्योंकि आपके आगमन से अचेत जीव भी जाग जाते हैं । संत राज दरबार में पहुँचे । राजा ने दरबारियों के सहित खड़ा होकर संत को प्रणाम किया, सुन्दर आसन देकर बैठाया । राजा बोले - सेवा ? संत - क्या सेवा ? आपके पुत्र को शेर ने मार दिया । राजा - मेरे पुत्र को नहीं मारा । संत - क्यों ? 
राजा - *दृष्टान्त सुनो* - 
हरिद्वार के कुम्भ पर्व पर नगरवासी लोग पर्व - स्नान करने को चल पड़े । नगर के दो कुत्ते भी उनके साथ हो लिये । आगे चलकर यात्रियों का पड़ाव पड़ा और रोटी पानी बनाने लगे । कुत्तों ने विचार किया, अपन भी चलें । पास में नगर था । दोनों कुत्ते गए । एक उत्तर की तरफ नगर में गया, एक दक्षिण की तरफ । जो कुत्ता उत्तर की तरफ नगर में गया, वह एक सात्विक ईश्वर भक्त ब्राह्मण के घर पहुँचा । थाली में रोटी परसी हुई थी । अचानक वह कुत्ता आकर खाने लगा । ब्राह्मण ने देखा कि आज का यह भोजन इसी के लिखा था । थाली को हटवा दिया । कुत्ते ने भोजन करके मन से आशीर्वाद दिया कि आपकी जय हो । दूसरा दक्षिण की तरफ जो गया था, वह एक दुकानदार के यहाँ पहुँचा । उसके यहाँ कोई बदमाश कुत्ता रोज दुकान में नुकसान करता, परन्तु दुकान वाले ने उसे कभी देखा नहीं था । इस कुत्ते को दुकानदार ने दूर से आता देखा, सोचा कि यही कुत्ता है जो मेरे रोज दुकान में नुकसान करता है । जब कुत्ता दुकान के अन्दर आगे बढ़ा, दुकानदार ने चुपके से पीछे से दरवाजा बन्द कर दिया और डंडा लेकर उसको पीटता है और बोलता है कि - "ले खा घी ! ले खा गुड़ ! ले खा आटा !" इस प्रकार कई डंडे मारकर बाहर निकाल दिया । वह कुत्ता मन से श्राप देता हुआ चला और अगले कुत्ते से जाकर मिला । उपरोक्त वृत्तान्त सब सुनाया । वह कुत्ता बोला - मैं अपना बदला दुकानदार से लूंगा और उसे दुःख दूँगा । दूसरा बोला - मुझे ब्राह्मण ने सुख दिया है, मैं उसे सुख दूँगा । दोनों कुत्ते काशी जा पहुँचे । दशाश्वमेघ घाट पर गंगा - स्नान किया । काशी करवत पर आकर अपनी - अपनी कामना लेकर शरीर छोड़ दिया । एक ब्राह्मण का पुत्र बना, सुख दिया । दूसरा दुकानदार का पुत्र बना । जब जन्मा, तभी दुकानदार के चोरी हो गई । कुछ दिन के बाद आग लग गई । लड़का कुछ बड़ा हुआ तो यदि गोदी में नहीं ले, तो रोने लगे । गोदी में लेवे तो कुचेष्टा करने लगे कभी खोपड़ी में काट ले, कभी दुकानदार की चुटिया पकड़ कर हिलाने लगे । एक रोज दुकानदार का दांतों से कान काट लिया । नीचे उतारा तो रोने लगा । फिर गोदी में लेकर कंधे पर बिठाया तो उसकी आंख में अंगुली डाल दी । दुकानदार की आँख फूट गई । इस प्रकार उसका बुरा हल बना दिया । मौन रहता है, बोलता कुछ नहीं । एक रोज दुकानदार के कंधे पर बैठा था । पीछे से संत आए । संत बोले, अब तो तूँ राजी है, बदला चुका लिया । लड़के ने दोनों हाथ जोड़ कर नमस्कार किया और इशारे में कहा, आप तो जाइये । संत बोले - "अच्छा !" दुकानदार ने देखा संत को । "यह लड़का हम से तो बोलता ही नहीं, पांच साल हो गए । संत को नमस्कार किया । चलूं संत को पूछूं ।" लड़के को नीचे उतारा और दौड़ कर संत के चरण - स्पर्श किए । बोला - "महाराज यह कौन है ?" संत बोले - तेरा लड़का है । "महाराज ! इससे मैं बड़ा दुखी हूँ ।" संत - तूने पांच साल पहले किसी कुत्ते को पीटा था ? बनिया "हाँ ।" तो बस इसको किसी संत का चेला बना दे ।" संत यह कहकर चल दिए । दुकानदार किसी गांव में एक संत के पास जाकर यह लड़का चढ़ा दिया और अपना पिंड छुड़ाकर राजी हुआ । राजा संत से बोला - मेरा लड़का नहीं होगा, जिसको मारा है, वह कोई कुत्ता होगा । अपना बदला चुका लिया, तो अच्छा हुआ । 
नारद जी यह सुनकर रोमांचित हो गए और धन्य - धन्य कहने लगे । ये सच्चे भक्त हैं । भगवान् से प्रार्थना की । भगवान् विष्णु प्रकट हो गए । नारद ने भगवान् से नमस्कार किया और कहा - हे नाथ ! यह भक्त ध्यान करने के योग्य ही है, ऐसा मैंने निश्चय किया । नारद ने संकल्प किया कि राजकुमार चला आवे । उसी समय घोड़े पर सवार होकर राजकुमार आ गया । भगवान् विष्णु और नारद के चरण - स्पर्श किए । माता - पिता को नमस्कार किया । राजकुमार को भगवान् ने राजतिलक किया । राजा मोहमर्द को और उनकी रानी को भगवान् अपने साथ विमान में लेकर परम धाम को चले गए । नारद वीणा बजाते हुए त्रिलोकी में भ्रमण करने लगे । ऐसे ही राजा बलि का आख्यान समझना । बोलिये भक्त भगवान् की जय । ऐसे भक्तों को भगवान् जपते हैं और भक्त भगवान् को जपते हैं ।
(क्रमशः)

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