॥दादूराम सत्यराम॥
*"श्री दादूदयाल वाणी(आत्म-दर्शन)"*
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज
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*= परिचय का अंग - ४ =*
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*दादू मांहि कीजै आरती, मांहि पूजा होइ ।*
*मांहि सतगुरू सेविये, बूझै विरला कोइ ॥२६५॥*
टीका - हे जिज्ञासुओं ! सतगुरु का दिया हुआ आत्मज्ञान है, उससे आत्म - अनात्म का विवेक करके समस्त वृत्तियों को आत्म - परायण बनाइये । यही सच्ची ब्रह्मनिष्ठ सतगुरु की सेवा है । किन्तु मानसिक पूजा की यह विधि कोई संतजन ही जानते हैं ॥२५६॥
हरि सेवा द्वादश बरस गुरु सेवा पल चार ।
ताके पटंतर ना तुलै, "परसा" धर्म अपार ॥
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*संत उतारैं आरती, तन मन मंगलचार ।*
*दादू बलि बलि वारणैं, तुम पर सिरजनहार ॥२६६॥*
टीका - हे जिज्ञासुओं ! पूर्वोक्त प्रकार से जो संतजन परमात्मा की आरती करते हैं, उनके शरीर, मन और इन्द्रियों में परम आनन्द वर्तता है । अब विनय करते हैं कि हे सिरजनहार परमेश्वर ! हम आपके दर्शनों के लिए अपने तन - मन आदि को बारंबार आपके भेंट करते हैं । इसलिये अब ऐसी कृपा करिये कि इस तन - मन को आपके समर्पित करके आपका दर्शन करें ॥२६६॥
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*दादू अविचल आरती, जुग - जुग देव अनन्त ।*
*सदा अखंडित एक रस, सकल उतारैं संत ॥२६७॥*
टीका - हे जिज्ञासुओं ! प्रभु से ऐसी विनती करो - "हे परमेश्वर ! आपकी अविचल आरती रूप भक्ति को अनन्तरूप बनाकर हमें युग - युगान्तर समय तक दीजिये । सदैव आपके संतजन आपकी भक्ति में अखण्ड एकरस हो जायें अथवा सर्व संतों की सुरति आपके स्वरूप में ही एकरस तदाकार हो जावे, ऐसी कृपा करें ॥२६७॥"
(क्रमशः)

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