गुरुवार, 20 दिसंबर 2012

= परिचय का अंग =(४/२६८)

॥दादूराम सत्यराम॥
*"श्री दादूदयाल वाणी(आत्म-दर्शन)"* 
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी 
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज 
*= परिचय का अंग - ४ =*
.
*॥ सौंज मंत्र ॥* 
सत्यराम, आत्मा वैष्णव, सुबुद्धि भूमि, संतोंष स्थान, मूल मंत्र, मन माला, गुरु तिलक, सत्य संयम, शील शुचिता, ध्यान धोवती, काया कलश, प्रेम जल, मनसा मंदिर, निरंजन देव, आत्मा पाती, पुहुप प्रीति, चेतना चंदन, नवधा नाम, भाव पूजा, मति पात्र, सहज समर्पण, शब्द घंटा, आनन्द आरती, दया प्रसाद, अनन्य एक - दशा, तीर्थ सत्संग, दान उपदेश, व्रत स्मरण, षट् गुण ज्ञान, अजपा जाप, अनुभव आचार, मर्यादा राम, फलदर्शन, अभि अन्तर सदा निरन्तर सत्य सौंज दादू वर्तते, आत्मा उपदेश, अंतर्गति पूजा ॥२६८॥
(प्रसंग - यह सौंज मन्त्र श्री दादूदयालजी ने जयमलजी कछवाहा को शिष्य बनाते समय आमेर में दिया था ।)
*सत्य*
टीका - निर्गुण ब्रह्म है, वही सत्य है । और जो बात जैसी देखी,सुनी एवं मन में हो, उसको वैसे ही वाणी द्वारा प्रकट करनासत्य कहलाता है ।
सत्य सु दोइ प्रकार, एक सत्य जो बोलिये ।
मिथ्या सब संसार, दूजो सत्य सु ब्रह्म है ॥
साँच बराबर तप नहीं, झूठ बराबर पाप ।
जाके हृदय साँच है, ताके हृदय आप ॥
श्लोक - 
नहि सत्यात्परो धर्मो, नानृतात्पातकं परम् ।
नहि सत्यात्परं ज्ञानं, तत्मात्सत्यं समाचरेत् ॥
सत्य से श्रेष्ठ अन्य कोई धर्म नहीं है और झूठ के बराबर अन्य कोई पाप नहीं है । ऐसे ही सत्य से श्रेष्ठ और कोई ज्ञान नहीं है । इसलिए सत्य का ही आचरण करना चाहिए ।
श्लोक -
सत्यं धर्मस्तपो योगः, सत्यं ब्रह्म सनातनम् ।
सत्यं यज्ञः परः प्रोक्तः, सर्वं सत्ये प्रतिष्ठितम ॥
धर्म, तप, योग, परब्रह्म, जितना कुछ कल्याणस्वरूप है, वह सब सत्य ही है । सत्य में सब आ जाता है । इसलिए सदैव आत्मा के अनुकूल आचरण करो ।
श्लोक -
यत्तदग्रे विषमिव, परिणामेSमृतोपमम् ।
तत्सुखं सात्विकं प्रोक्तं, आत्म - बुद्धिप्रसादजम् ॥
जो प्रथम तो विष की तरह कटु और दुःखदायक मालूम होता है, परन्तु पीछे अमृत के तुल्य मधुर और हितकारक बनाता है, वही सच्चा सात्विक सुख है, ऐसा सुख आत्मा और बुद्धि की प्रसन्नता से उत्पन्न होता है ।
शंका - आत्मा और बुद्धि की प्रसन्नता का क्या उपाय है ?
उत्तर - मिथ्या आचरण छोड़कर मनुष्य को सदैव सत्य का ही बर्ताव करना चाहिये । इसी से मन और बुद्धि को सच्ची प्रसन्नता प्राप्त होती है और ऐसा सच्चा सुख प्राá होता है, जिसका कभी नाश नहीं होता । सत्य से ही सारा संसार चल रहा है । यदि सत्य एक क्षण के लिये भी अपना कार्य बन्द कर दे, तो प्रलय हो जाय । संसार की भौतिक शक्तियाँ भी सब सत्य से ही चल रही हैं ।
"सत्यराम के आसरे, सप्त द्वीप नौ खण्ड ।
सत्यराम होता नहीं, बह जाता ब्रह्मण्ड ॥ "
श्लोक - 
सत्येन धार्यते पृथ्वी, सत्येन तपते रविः ।
सत्येन वाति वायुश्च, सर्वं सत्ये प्रतिष्ठितम ॥
सत्य से ही पृथ्वी, रवि इत्यादि सब स्थित हैं ।
सत्यमेव जयते, नानृतम् । सत्येन पन्था विततो देवयानः ॥
सत्य की ही विजय सदैव होगी, मिथ्या की नहीं । सत्य के ही मार्ग से परमात्मा मिलेगा । सब प्रकार के कल्याण का ज्ञान सत्य से ही होगा ।
सत्यव्रतं सत्यपरं त्रिसत्यं, सत्यस्य योनौनिहितं च सत्ये ।
सत्यस्य सत्यं ऋतसत्य - नेत्रं, सत्यात्मकं त्वां शरणं प्रपद्ये ॥
हे सत्यव्रत ! हे सत्य से भी श्रेष्ठ ! हे तीनों लोक और तीनों काल में सत्यस्वरूप ! हे सत्य के उत्पत्ति स्थान ! हे सत्य में रहने वाले ! हे सत्य के भी सत्य ! हे कल्याणकारी ! सत्य के मार्ग पर ले चलने वाले सत्य की आत्मा, हम आपकी शरण आये हैं ।
दादू सांई मेरा सत्य है, निरंजन निराकार ।
नाम निरंजन निर्मला, दूजा घोर अँधार ॥
राम "रमन्ति योगिनो यस्मिन्निति रामः ।" 
जो सब में रमा हुआ है, वह राम और जिसमें योगीजन विचरण करते हैं, वही राम है ।
राम = र + अ + म = र(वैराग्य), अ(ज्ञान), म(भक्ति) ।
"रकारहेतुर्वैराग्यं परमं यच्च कथ्यते ।
अकारो ज्ञानहेतुश्च, मकारो भक्तिहेतुकः ॥(महारामायण)
रकारोSनलबीजं स्यात् ये सर्वं वाडवादयः ।
कृत्वा मनोबलं सर्वं भस्मकर्म शुभाशुभम् ॥
अकारो भानुबीजं स्यात् वेदशास्त्रप्रकाशकम् ।
नाशत्येव सद्दीप्त्याSविद्या हृदये स्थिता ॥
मकारश्चन्द्रबीजं च पीयूषपरिपूर्णकम् ।
त्रितापं हरते नित्यं शीतलत्वं करोति च ॥
सर्वेषामेव मन्त्राणां, राममन्त्रः परात्परः ।
रामनाम्नः समुत्पन्नः, प्रणवो मोक्षदायकः ॥
शतकोटिमहामंत्राः चित्तविभ्रमकारकाः ।
तेषां मध्ये एकं रत्नं, रामेति अक्षरद्वयम् ॥
यह सौ करोड़ महामंत्र मैंने रचे हैं । ये चित्त में भ्रम पैदा करने वाले हैं । इन सौ करोड़ के बीच में दो अक्षर "राम" ही रत्नरूप हैं । यही हमारा देव है ।(वाल्मिकि)
ससै शील तन उपजै, ततै ताप तन जाइ ।
ररै रोग व्यापै नहीं, ममै मुक्त ह्वै जाइ ॥(सत्तराम) ॥
शंका - ऐसा जो सत्यस्वरूपी राम है, उसका पुजारी कौन है ?
उत्तर - आत्मा वैष्णव ।
*आत्मा वैष्णव
*
दंडवत डर छाडै नहिं, निडर न कबहुँ होइ ।
करै वन्दगी वन्दना, परम वैष्णव सोइ ॥
हरि डर, गुरु डर, गांव डर, चौथा धर्म अरु धाम ।
ऐते डर जिहिं उर बसैं, क्यौं न सरै सब काम ॥
छन्द - 
इन्द्रिय दवन कृपालु, क्रोध क्षमा सत्य भाखे,
पाप रहित सम दृष्टि, निष्कामी सुचि राखे ।
कोमल चित्त उदार, धर्मदत्त धीरजवंता,
निस्पृहा हरि शरण, मान रहित धीमंता ॥
जीत्यो अन्तःकरण, सावधान गुण गावे,
भोजन अल्प अनीह, निर्विकार पद पावे ।
षट् उर्मि वश करण, वांछित बुद्धि न कोई,
चतुरदास उणतीस गुण, कहिये वैष्णव सोई ॥
(षट् उर्मि = शीत, उष्ण, सुख, दुःख, मान, अपमान)
*सुबुद्धि भूमि*
स्थितप्रज्ञा ही शुद्ध भूमि है ।
बुद्धि भूमि को शुद्ध कर, चौको चोखी चाल । कलश कमल उपदेश जल, युक्ति जगन्नाथ रसाल ॥
सुरति चौका युक्ति धोती, तिलक करणी होय । भाव भोजन "नानका" बिरला बूझे कोय ॥
*संतोंष स्थान*
देह को प्रारब्ध आगे रहै, कल्पना छोड़ निष्कल्प होई । 
यथा लाभ वेद मुनि कहत हैं, परम संतोंष शिष्य जान सोई ॥
सत्य संतोंष धीरज दया, हित रुचि शर्म स्नेह । 
जगन्नाथ जगदीश की, सेवा शिरोमणि येह ॥
श्लोक - 
सर्पाः पिबन्ति पवनं, न च दुर्बलास्ते
शुष्कैस्तृणैर्वनगजा बलिनो भवन्ति । 
कन्दैः फलैमुनिवराःक्षपयन्ति कालं
संतोंष एव पुरुषस्य परमं निधानम् ॥
सर्प हवा पीकर रहते हैं, तथापि वे दुर्बल नहीं हैं । जंगल के हाथी सूखे तृण खाकर रहते हैं, फिर भी वे बली होते हैं । मुनिवर लोग कन्द, मूल, फल खाकर ही काल - क्षेप करते हैं । संतोंष ही मनुष्य का शांति स्थान और परम धन है । वासना - रहित वृत्ति की दशा ही उसका घर है ।
*मूल मन्त्र
*
मन्त्र - तन्त्र ग्रन्थों में मन्त्र शब्द की निरुक्ति(मन + त्र) दो शब्दों से की गई है अर्थात् व्यक्ति मनन करता हुआ जिससे त्राण(मुक्ति) प्राप्त करता है - "मननं विश्वविज्ञानं त्राणं संसार - बन्धनात् । यतः करोति संसिद्धिं मंत्र इत्युच्यते तदा ।" मन्त्र का उच्चारण गुप्त रूप से किया जाता है - "मंत्र्यते गुप्तं परिभाष्यते ।" क्योंकि मंत्र का सम्बन्ध अन्तःकरण(मन और बुद्धि) से होता है । मन्त्र सिद्धि - मन्त्र में जितने वर्ण होते हैं, उतने ही लक्ष(लाख) जाप नित्य करने से लक्ष्य(सिद्धि) की प्राप्ति का विधान कहा गया है ।
"ओमिति ब्रह्म विज्ञेयं मूलं संसारकारणम् ।"
"मननं सर्ववेदित्वं त्राणं संसार्यनुग्रहः । 
मननात् त्राणधर्मत्वान्मन्त्र इत्यभिधीयते ॥ "
दादू सींचे मूल के, सब सींच्या विस्तार । 
दादू सींचे मूल बिन, बाद गई बेगार ॥
*मन माला*
सतगुरु माला मन दिया, पवन सुरति सौं पोइ । 
बिन हाथों निसदिन जपै, परम जाप यों होइ ॥
रज्जब माला मन की, जाको सतगुरु देइ । 
सो सूत कांधे काठ का, कबहुँ भार न लेइ ॥
माला बनाई काठकी, जामें डाला सूत । 
माला बेचारी क्या करे, जपने वाला कपूत ॥
पांच पचीसों त्रिगुण मन, यह माला जिय हेर । 
रज्जब हित के हाथ से, आठों पहर सु फेर ॥
त्यों तिरिया पीहर बसे, सुरति रहे पिय मांहि । 
ऐसे जन जग में रहे, हरि को भूले नांहि ॥
*गुरु तिलक*
और सबै ही फीका, हरि नाम सबन का टीका ।
तत्त तिलक तिहुं लोक में, राम नाम निज सार । 
राम नाम बिन संतदास, कोइ न उतरे पार ॥
गुरु का सत्य उपदेश ही तिलक है ।
*सत्य संयम
*
शील सांच सन्तोष शुचि, संयम यह बपु होइ । 
यह नित प्रति संयम व्रत, पावन पातक खोइ ॥
*शील शुचिता*
शील सत्य हि स्नान शुचि, मंजन वपु हिय होय । 
यह नित प्रति संजम बरत, पावन पातक खोय ॥
ब्रह्मचर्येण तपसा देवा मृत्युमुपाघ्नतः ।
ब्रह्मचर्य और तप के बल पर ही देवता लोग मृत्यु को जीत लेते हैं । अखंड ब्रह्मचर्य की रक्षा पवित्रता है ।
मरणं बिन्दुपातेन, जीवनं बिन्दुधारणात् ।
वीर्य की एक बूंद भी शरीर से गिरा देना मृत्यु है और एक बूंद की भी अपने अन्दर रक्षा करना ही जीवन है ।
मृतका जल कर बपु मल हरिये । 
हरि गुण गा मन निर्मल करिये ॥ 
रागादिक त्यागे हृद शुद्धम् । 
शौच उभै विधि कहे प्रबुद्धम् ॥
"शील व्रतेष्वनतिचारः" अनतिचार का मतलब जीवन अस्त - व्यस्त न हो, शान्त और सबल हो । रावण के विषय में कुख्यात है कि वह दुराचारी था, किन्तु यह भी उसका विख्यात विशुद्ध व्रत था कि वह किसी नारी के साथ बलात्कार नहीं करेगा । यही कारण था कि वह सीता को हरण तो कर लाया किन्तु उसका शील - भंग नहीं कर पाया । इसका प्रमुख कारण उसका "शीलव्रत" था ।
"निरतिचार" व्रत के पालन में यदि कोई गड़बड़ न हो तो आत्मा और मन पर एक ऐसी गहरी छाप पड़ती है कि खुद का निस्तार तो होता ही है, अन्य भी जो इस व्रत और व्रती के सम्पर्क में आते हैं, प्रभावित हुए बिना नहीं रहते । अनतिचार व्रत पालन की महिमा अद्भुत है ।
दृष्टान्त - एक भिक्षुक था । झोली लेकर वह एक द्वार पर रोटी मांगने पहुँचा । रूखा जवाब मिलने पर भी नाराज न होकर आगे चला गया । एक थानेदार को उस पर तरस आ गया और उसने उसे रोटी लेने के लिये बुलाया । पर भिक्षुक थोड़ा आगे जा चुका था, इसलिये थानेदार ने एक नौकर के हाथ रोटी भिजवाई । "मैं रिश्वत का अन्न नहीं खाता, भइया ।" यह कहकर वह भिक्षुक आगे बढ़ गया । नौकर ने आकर थानेदार को भिक्षुक द्वारा कही बात सुना दी । ये शब्द उस थानेदार के मन में गहरे उतर गए । उसने रिश्वत लेना छोड़ दिया । भिक्षुक के निरतिचार व्रत ने थानेदार की जिन्दगी सुधार दी ।
जो लोग गलत तरीके से रुपये कमाते हैं, वे दान में अधिक उदारता दिखाते हैं । वे सोचते हैं कि दान द्वारा धर्म इकट्ठा कर लिया जाये तो पाप कर्म दोष नष्ट हो जाता है, किन्तु धर्म ऐसे नहीं मिलता । धर्म अपने श्रम से निर्दोष रोटी कमाकर दान देने में ही है ।
*ध्यान धोवती*
धर्म धारणा धोवती, भूत दया आचार । 
बरते लय विवेक सौं, बरतन सौंज विचार ॥
*काया कलश*
अनुभव सेझा कूप का, निगम कलश हैं चार । 
जन रज्जब ता नीर की, सब पंडित पनिहार ॥
मानव शरीर है, यही पूजा के जल का कलश है ।
*प्रेम जल*
छन्द -
प्रेम लग्यो परमेश्वर से तब, भूल गयो सबही घरबारा । 
ज्यूँ उनमत्त फिरै जित ही तित, नेक रही न शरीर संभारा ॥
श्वास उच्छ्वास उठे सब रोम, चले दृग नीर अखंडित धारा । 
सुन्दर कौन करै नवधा विधि, छाक पर्यो रस पी मतवारा ॥
*मनसा मन्दिर*
मनसा मैली पापिनी, पुण्य पानी से धोइ । 
सुमिरण साबुन देइ कर, रज्जब उज्वल होइ ॥
वृत्ति में सत्वगुण स्थिर करना, यही मंदिर बनाना है ।
*निरंजन देव*
दादू देव निरंजन पूजिये, पाती पंच चढ़ाइ । 
तन मन चन्दन चर्चिये, सेवा सुरति लगाइ ॥
छन्द -
जा प्रभु तैं उत्पत्ति भई यह, सो प्रभु है उर इष्ट हमारे । 
जो प्रभु है सबके शिर ऊपर, ता प्रभु को शिर ही हम धारे ॥
रूप न रेख अलेख अखंडित, भिन्न रहै सब कारज सारे । 
नाम निरंजन है तिन को पुनि, सुन्दर ता प्रभु की बलिहारे ॥
इस मंदिर में माया अविद्या की उपाधि रहित शुद्ध चैतन्य निरंजन की प्रतिष्ठा करना है ।
*आत्मा पाती*
दादू कच्छब अपने कर लिये, मन इन्द्रिय निज ठौर । 
नाम निरंजन लागि रहु, प्राणी परिहर और ॥
इन्द्रियों को अन्तर्मुख करना ही तुलसी - पत्र चढ़ाना है ।
*पुहुप प्रीति*
पुहुप प्रेम बरसै सदा, हरिजन खेलें फाग । 
अैसा अचरज देखिया, दादू मोटे भाग ॥
पुहुप सु पंच चढ़ाइये, पाती ताहि पचीस । 
कबीर प्रेम प्रीति सौं, सेवा करै जगदीश ॥
*चेतना चंदन*
चितवन चन्दन चरचि नित, सूक्ष्म सौंज सजंत । 
कबीर अन्तर आरती, अनहद नाद बजंत ॥
धूप ध्यान ही उर धरे, दीपक ज्ञान प्रकाश । 
चरचे चंदन चेतना, चेतन अंग सुवास ॥
*नवधा नाम*
नवधा दशधा नांव में, सब संतों की साख । 
जन रज्जब सो सुमरिये, कहा करे वीतराग ॥
श्लोक - श्रवणं कीर्तनं विष्णुं, स्मरणं पाद - सेवनम् । 
अर्चनं वंदनं दास्यं, साख्यं आत्मनिवेदनम् ॥
*भाव पूजा*
छन्द - आपने भाव ते सेवक साहिब
आपने भाव सबै कोउ ध्यावै । 
आपने भाव ते अन्य उपासत
आप न भाव ते भक्त हु गावै ।
आपने भाव ते दुष्ट संहारन
आपने भाव ते बाहिर आवै । 
जैसे हि आपनो भाव है सुन्दर
ताहि कूं तैसो हि होइ दिखावै ॥
*मति पात्र*
मति बुद्धि विवेक विचार बिन, मानस पशु समान । 
समझायां समझै नहीं, दादू परम गियान ॥
संकल्प रहित जो बुद्धि है, वही पूजा के पात्र हैं ।
*सहज समर्पण*
तन भी तेरा मन भी तेरा, तेरा पिंड पराण । 
सब कुछ तेरा, तूँ है मेरा, यह दादू का ज्ञान ॥
वृत्तियों को निद्र्वन्द्व करना यही समर्पण है ।
*शब्द घंटा*
घंटाघर में घोर धुनि, अनहद नाद बजन्त । 
कबीर तहाँ बिलंबिया, जहाँ आपै आप अनन्त ॥
प्रणव ध्वनिरूप घंटा है ।
*आनन्द आरती*
बाहर भीतर दर्शन भई, हिरदै तपति गई मोहि । 
जहँ तहँ राखौं दृष्टि भरि, तहँ तहँ देखौं तोहि ॥
अविगति आरत आरती, वारिये पुनि आहलाद । 
घंटा घट में घोर धुनि, बाजा अनहद नाद ॥
*दया प्रसाद*
दया सो तीन प्रकार की, मन बच कहिए काहि । 
हतै न काहू जीव को, शब्द न कहै दुखाहि ॥
स्वस्वरूप का परिचय प्राप्त होने की दया ही प्रसाद है ।
*अनन्य एक दशा*
दादू एकै दशा अनन्य की , दूजी दशा न जाइ । 
दूजा देखत जाइगा, एकै रहै समाइ ॥
लय वृत्ति की स्थिरता, समाधि दशा, वही एक दशा है ।
*तीर्थ सत्संग*
सत्संग नित्य प्रति कीजिये, मति होइ निर्मल सार रे । 
रति प्राणपति सौं उपजे, अति लहै सुख अपार रे ॥
मुख नाम हरि हरि उच्चरे, श्रुति सुणत गुण गोविन्द रे । 
रट ररंकार अखंड धुनि, तहँ प्रगट पूर्ण चन्द रे ॥
सतगुरु बिना नहीं पाइये, यह अगम उलटा खेल रे । 
कहै दास सुन्दर देखतां, होइ जीव ब्रह्म ही मेल रे ॥
*दान उपदेश*
दान कहत हैं उभै विधि, सुनि शिष्य करहि प्रवेश । 
एक दान कर दीजिये, एक दान उपदेश ॥
एक दान उपदेश, सु तो परमार्थ होई । 
दूसर अन्न रु वस्त्र, देही कर पोषै कोई ।
पात्र कुपात्र हु देख, भलि भूमि उपजे धानम् । 
सुन्दर देख विचार, उभै विधि कहिये दानम् ॥
*व्रत स्मरण*
दया निबैरता सर्व से, यह दो व्रत विचार । 
जगन्नाथ सबसे श्रेष्ठ, व्रत हि पर उपकार ॥
आत्म-चिंतन यह व्रत है ।
*षट् गुण ज्ञान*
अमानित्वं, अदंभित्वं, अहिंसा
क्षान्तिः(क्षमा), आर्जवम्(कोमलता) । 
आचार्योपासनं शौचं, स्थैर्यं आत्मनिग्रहः ॥(गीता १३ - ७)
गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं कि परम तत्व(ब्रह्मज्ञान) के लिये अपने जीवन में ये छः गुण लाने अनिवार्य है - 
(१) अभिमान का अभाव,(२) दम्भपूर्ण आचरण का अभाव,(३) हिंसात्मक वृत्ति का अभाव,(४) क्षम्य भाव(क्रोध का अभाव),(५) सरलता वा विनम्रता(६) गुरु में श्रद्धा व सेवा भाव ।
"छह ढाला"(जैन धर्म) में वर्णित छः गुण -
"समता सम्हारैं(थुति) उचारैं वन्दना जिन देव को । 
नित करैं श्रुतिरति करैं, प्रतिक्रम तजैं तन अहमेव को ॥
(१) समता(रागद्वेष न रखना),(२) स्तुति(प्रभु - प्रार्थना),(३) वन्दना(प्रभु एवं गुरुजनों को नमस्कार),(४) स्वाध्याय(ज्ञान व वैराग्य वर्धक शास्त्रों का मनन - चिन्तन),(५) प्रतिक्रमण(प्रायश्चित्त द्वारा दोष निवारण),(६) कायोत्सर्ग(देह ममता तथा अहंभाव का त्याग)
षट कर्म उज्वल करै, पांचों इन्द्रिय चित्त । 
नाम नेम नवधा धरै, अर्चा आरंभ नित्त ॥
*अजपा जाप*
मन पवन अरु सुरति सौं, आतम पकड़े आप । 
रज्जब लावे तत्व सो, यह अजपा जाप ॥
*अनुभव आचार*
दादू अनुभै काटै रोग को, अनहद उपजै आइ । 
सेझे का जल निर्मला, पीवै रुचि ल्यौ लाइ ॥
स्वरूप निश्चय साक्षात् परिचय रूप अनुभव ही साधक का आचार है ।
*मर्यादा राम*
मर्यादा परब्रह्म की, ममता छुवै न मूल । 
भैगत भाव रु भ्रम तज, रहो निःशंक न भूल ॥
सार्वभौम आत्मा की उपादेयता से भिन्न कोई कर्म या व्यापार न करना, यही मर्यादा है ।
*फल दर्शन*
ऐसा एक अनूप फल, बीज बाकुला नांहि । 
मीठा निर्मल एक रस, दादू नैनहुँ मांहि ॥
*अभिअंतर सदा निरंतर*
दादू निरंतर पीव पाइया, तीन लोक भरपूर । 
सब सेजों सांई बसै, लोक बतावैं दूर ॥
*सत्य सौंज दादू वर्तते, आत्म उपदेश अंतर्गत पूजा ॥*
ब्रह्मऋषि दादू दयाल जी महाराज कहते हैं कि जो सच्चे साधक हैं । उनके लिए यही सामग्री पूजा की है, जिसको संतजन उत्पन्न करते हैं । अब जिज्ञासुजनों को अन्तःकरण में पूजा करने की विधि का उपदेश ही धारण करना चाहिये ।
मातृवत् परदारेषु, परद्रव्येषु लोष्ठवत् । 
आत्मवत्सर्वभूतेषु, यः पश्यति सः पश्यति ॥
व्यापक ब्रह्म उपासना, सुन्दर अजपा जाप । 
यही जाप से जात हैं, सुन्दर सब ही ताप ॥
छन्द - 
स्वामी संगा देव अभंगा, निर्मल अंगा सेवै जू ।
कर भाव अनूपं पाती पुष्पं, गंधं धूपं खेवै जू ।
नहिं कोऊ आसं काटे पासं, इहि विधि दासं निष्कामं ।
शिष्य ऐसा जाने निश्चय आने, पूजा ठाने दिनयामं ॥
 ॥ इति श्री सौंज मंत्र की टीका ॥ 

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