शनिवार, 22 दिसंबर 2012

= परिचय का अंग =(४/२७७-९)


॥दादूराम सत्यराम॥
*"श्री दादूदयाल वाणी(आत्म-दर्शन)"* 
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी 
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज 
*= परिचय का अंग - ४ =*
.
*ये चारों पद पलंग के, साँई की सुख सेज ।*
*दादू इन पर बैस कर, साँई सेती हेज ॥२७७॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! इस साखी के चारों पद ही परमात्मा की हृदयरूपी सेज के मानो पाये हैं । अहंकार की निवृत्ति, अन्तःकरण की शुद्धि, वृत्ति की लय दिशा और स्वस्वरूप स्थिति, ये उस निर्विकल्प समाधिरूप पलंग के चार पाये हैं । ऐसे पलंग पर बैठकर परमात्मा से अति अनुराग करो ॥२७७॥ 
प्रथम विवेक वैराग्य पुनि, समाधि षट् सम्पत्ति । 
कहि चतुर्थ मुमुक्षुता, ये चव साधन सत्ति ॥ 
"विचार - सागर" ग्रन्थ में प्रतिपादित उक्त चार साधन भी चार पाये रूप ही जानिये ।
.
*प्रेम लहर की पालकी, आतम बैसे आइ ।*
*दादू खेलै पीव सौं, यहु सुख कह्या न जाइ ॥२७८॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! परमेश्वर के प्रेम की लहर ही मानो पालकी है, जिसमें "आतम बैसे आइ" अर्थात् आत्मज्ञानी पुरुष, तन - मन की सर्व वृत्तियाँ अन्तर्मुख करके स्वस्वरूप प्रेम में ही लयलीन होते हैं । इस प्रकार मुक्तजन अपने प्रीतम स्वरूप में ही रम रहे हैं और अब अकथनीय परमानन्द का अनुभव करते हैं ॥२७८॥ 
.
*अर्चना भक्ति*
*दादू देव निरंजन पूजिये, पाती पंच चढाइ ।*
*तन मन चंदन चर्चिये, सेवा सुरति लगाइ ॥२७९॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! पंच इन्द्रियों के शब्द आदिक को परमेश्वरार्थ विषयों को त्याग कर एवं ईश्वर अर्पण करके निरंजन को पूजिये और चन्दनरूप तन - मन को परमेश्वर में लीन करके परमेश्वर में अखंड सुरति लगा कर सेवा कीजिये ॥२७९॥ 
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें