रविवार, 23 दिसंबर 2012

= परिचय का अंग =(४/२८०-२)

॥दादूराम सत्यराम॥
*"श्री दादूदयाल वाणी(आत्म-दर्शन)"* 
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी 
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज 
*= परिचय का अंग - ४ =*
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*भक्ति भक्ति सब कोइ कहै, भक्ति न जाने कोइ ।*
*दादू भक्ति भगवंत की, देह निरन्तर होइ ॥२८०॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! सर्व ही संसारीजन परमेश्वर की भक्ति का भाव दर्शाते हैं । किन्तु भक्ति का जो मर्म है, उसको संतों के अतिरिक्त और कोई भी नहीं जानते हैं, क्योंकि परमेश्वर की भक्ति शरीर के भीतर ही होती है और संसारीजन बाह्य साधनों में भटकते हैं ।
ये तु सर्वाणि कर्माणि मयि - संन्यस्य मत्पराः । 
अनन्येनैव योगेन मां ध्यायन्त उपासते ॥ 
तेषामहं समुद्धर्ता मृत्यु - संसार - सागरात् । 
भवामि नचिरात्पार्थ मय्यावेशितचेतसाम् ॥ 
नमःस्तुति अरु कर्म समर्पण, 
पूजा चरण ध्यान पुनि जान । 
कथा श्रवण षट् अंग भक्ति के, 
नीके हेतु इन्हें पहिचान ॥ 
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*देही मांही देव है, सब गुण तैं न्यारा ।*
*सकल निरंतर भर रह्या, दादू का प्यारा ॥२८१॥* 
टीका - सत्व, रज, तम एवं आकाश आदिक गुणों से शून्य निरंजनदेव इस शरीर में व्यापक है और हे जिज्ञासुओं ! जो शरीर में व्यापक है, वही सारे ब्रह्माण्ड में भरपूर व्याप रहा है और वही प्रीतम प्यारा कहिए हमारा स्वस्वरूप है ॥२८१॥ 
देहो देवालयः प्रोक्तः स जीवः केवल: शिवः । 
त्यजेदज्ञाननिर्माल्यं सोSहम्भावेन पूजयेत् ॥ 
सर्वेन्द्रियगुणाभासं सर्वेन्द्रियविवर्जितम् । 
असक्तं सर्वभृच्चेव निर्गुणं गुणभोक्त्रु च ॥ 
अनादित्वान्निर्गुणत्वात्परमात्मायमव्ययः ।
शरीस्थोSपि कौन्तेय ! न करोति न लिप्यते ॥ 
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*जीव पियारे राम को, पाती पंच चढाइ ।*
*तन मन मनसा सौंपि सब, दादू विलम्ब न लाइ ॥२८२॥* 
टीका - हे प्यारे जीव ! अपनी ज्ञान इन्द्रियादिक पंच पाती को परमेश्वर परायण करके तन, मन और बुद्धि आदिक को परमात्मा के अर्पण करो । इसमें देरी नहीं करो ॥२८२॥ 
"कायेन वाचा मनसेन्द्रियैर्वा, 
बुद्धयात्मना वाSनुसृतस्वभावात् ।
करोति यद्यत् सकल परस्मै, 
नारायणायेति समर्पयेत् तत् ॥"
(भागवत)
(क्रमशः)

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