॥दादूराम सत्यराम॥
*"श्री दादूदयाल वाणी(आत्म-दर्शन)"*
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज
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*= परिचय का अंग - ४ =*
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*अध्यात्म ध्यान
*शब्द सुरति लै सान चित्त, तन मन मनसा मांहि ।*
*मति बुद्धि पंचों आतमा, दादू अनत न जांहि ॥२८३॥*
टीका - हे संतों ! शब्द, सुरति, चित्त, बुद्धि, पांचों ज्ञान इन्द्रियाँ, तन, मन, मनसा(इच्छा), आत्मा कहिए कारण शरीर, इन सबको एकाग्र वृत्ति करके परमेश्वर में लगाइये, अन्यत्र व्यर्थ क्यों भ्रमते हो ॥२८३॥
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*दादू तन मन पवना पंच गहि, ले राखै निज ठौर ।*
*जहाँ अकेला आप है, दूजा नांही और ॥२८४॥*
टीका - हे जिज्ञासुओं ! संतजन अपने तन, मन, प्राण और पंच इन्द्रियों को निग्रह करके स्वस्वरूप में लय लगाते हैं । और वह निज ठौर कैसा है ? जहाँ केवल ब्रह्मस्वरूप ही भासता है और द्वैतभाव का वहाँ पर अत्यन्त अभाव है । अपने शुद्ध स्वरूप में स्थित हो जाओ ॥२८४॥
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*दादू यहु मन सुरति समेट करि, पंच अपूठे आणि ।*
*निकटि निरंजन लाग रहु, संगि सनेही जाणि ॥२८५॥*
टीका - हे जिज्ञासुओं ! इस मन को, ब्राह्य सुरति समेट कर एवं पंच इन्द्रियों के विषय - व्यापार से हटाकर आत्म स्वरूप में लगाइये । आत्मा - स्वरूप परमेश्वर ही सदा परम स्नेही है । वह निरंजनदेव अपने हृदय में ही स्थित है । अपनी वृत्ति को उसी में लगाइये ॥२८५॥
(क्रमशः)

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