॥दादूराम सत्यराम॥
*"श्री दादूदयाल वाणी(आत्म-दर्शन)"*
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज
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*= परिचय का अंग - ४ =*
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*मन चित मनसा आत्मा, सहज सुरति ता मांहि ।*
*दादू पंचों पूर ले, जहँ धरती अंबर नांहि ॥२८६॥*
टीका - हे जिज्ञासुओं ! मन, चित्त, बुद्धि, साभास अखण्ड अन्तःकरण, विशिष्ट जीवात्मा, पंचों इन्द्रियें, इन सबको ब्रह्म - विचार में वृत्तियों सहित संलग्न करिये । उस ब्रह्म के स्वरूप में पाँच तत्व एवं शब्दादिक गुणों का अभाव है ॥२८६॥
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*दादू भीगे प्रेम रस, मन पंचों का साथ ।*
*मगन भये रस में रहे, तब सन्मुख त्रिभुवन - नाथ ॥२८७॥*
टीका - हे जिज्ञासुओं ! जब मन पंचों इन्द्रियों आदिक सहित प्रेम रस में ब्रह्म - परायण हुआ, तो फिर "मगन भये रस में रहे" अर्थात् भगवान् के प्रेम में तल्लीन होकर एकरस होते हैं । फिर उसके त्रिलोकीनाथ वश में हो जाते हैं ॥२८७॥
माठा तुरंग "हुसेन" मन अड़ा प्रेम की खोड़ ।
पग न धरे मग चलन को, ताजण टूटे करोड़ ॥
बालम चक्कर - व्यूह भो, मो मन अहमन नित्त ।
प्रेम प्रवेशा शिष्य यूं, निकसन जानत चित्त ॥
हुसेन भक्त कहता है - मेरा मन मादा और अड़ियल घोड़ा है जो प्रभु प्रेम की सँकड़ी गली(खोड़) में अड़ गया है । लोगों ने इसे बिरत करने हेतु बहुत प्रयत्न किये, अनेकों ताड़नाओं के चाबुक मार - मार कर तोड़ डाले, पर यह भक्ति - मार्ग से एक कदम भी नहीं हटा । गुरुपदेश से शिष्य का मन अभिमन्यु(अहमन) की भाँति प्रियतम प्रभु के प्रेमरूपी चक्रव्यूह में फँस तो गया, अब वह उससे निकल नहीं सकता ।
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*दादू शब्दैं शब्द समाइ ले, पर आतम सौं प्राण ।*
*यहु मन मन सौं बंधि ले, चित्तैं चित्त सुजान ॥२८८॥*
टीका - हे जिज्ञासुओं ! शब्द कहिए राम - नाम उच्चारण को अनहद शब्द में अभेद करिये, व्यष्टि शब्द समष्टि शब्द में लीन करिये और प्राण कहिए जीवात्मा को विचार के द्वारा परमात्मा में लीन करिये । इसी प्रकार इस व्यष्टि मन को समष्टि मन में जोड़िए । व्यष्टि चैतन्य को समष्टि चैतन्य में अभेद करिए । इस प्रकार पूर्ण ब्रह्म चैतन्य में अभेद हो जाइये ॥२८८॥
(क्रमशः)

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