॥दादूराम सत्यराम॥
*"श्री दादूदयाल वाणी(आत्म-दर्शन)"*
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज
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*= परिचय का अंग - ४ =*
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*दादू सहजैं सहज समाइ ले, ज्ञानैं बंध्या ज्ञान ।*
*सूत्रैं सूत्र समाइ ले, ध्यानैं बंध्या ध्यान ॥२८९॥*
टीका - हे जिज्ञासुओं ! स्मरण में सहज भाव होकर, सहज रूप परमेश्वर में समाइये और आत्मा के ज्ञान में संलग्न होकर अपरोक्ष ज्ञान रूप हो जाओ । इसी प्रकार "सूत्रैं" हिरण्य - गर्भ में सूत्र, व्यष्टि सूक्ष्म शरीर को अभेद करिये और ब्रह्म ध्यान में संलग्न होकर तद्रूप हो जाओ ॥२८९॥
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*दादू दृष्टें दृष्टि समाइ ले, सुरतैं सुरति समाइ ।*
*समझैं समझ समाइ ले, लै सौं लै ले लाइ ॥२९०॥*
टीका - हे जिज्ञासुओं ! अपनी दृष्टि को समष्टि चैतन्य रूप दृष्टि में समाओ अथवा व्यष्टि द्रष्टा को समष्टि द्रष्टा में विचार द्वारा अभेद करिये । समष्टि सुरतारूप चैतन्य में अपनी व्यष्टि सुरति को समा ले । समष्टि समझ रूप चैतन्य में अपनी व्यष्टि समझ को उसी का स्वरूप जानकर उसी में समा लो । अपनी व्यष्टि लय को समष्टि लय में लय द्वारा अभेद करो ॥२९०॥
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*दादू भावैं भाव समाइ ले, भक्तें भक्ति समान ।*
*प्रेमैं प्रेम समाइ ले, प्रीतैं प्रीति रस पान ॥२९१॥*
टीका - हे जिज्ञासुओं ! व्यष्टि भाव को समष्टि भाव में लय करिये । समष्टि भक्तिरूप परमेश्वर में अपनी व्यष्टिरूप आराधना को लय करिये । सर्व बाह्य विषयों से वृत्ति समेट कर ब्रह्म में संलग्न करके रसपान नाम आत्मरूप परमेश्वर के दर्शनामृत का अपनी आत्मा में पान करिए ॥२९१॥
(क्रमशः)

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