मंगलवार, 25 दिसंबर 2012

= परिचय का अंग =(४/२९२-४)


॥दादूराम सत्यराम॥
*"श्री दादूदयाल वाणी(आत्म-दर्शन)"* 
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी 
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज 
*= परिचय का अंग - ४ =*
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*दादू सूरतैं सुरति समाइ रहु, अरु बैनहुं सौं बैन ।*
*मन ही सौं मन लाइ रहु, अरु नैनहुँ सौं नैन ॥२९२॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! अपनी व्यष्टि सुरति को समष्टि सुरति रूप परमेश्वर में समा लेओ । अपने व्यष्टि बैन नाम वचन को समष्टि बैन रूप परमेश्वर में समाओ । अपने व्यष्टि मन को समष्टि मन में लय करो, क्योंकि यह उसी का स्वरूप है । अपने व्यष्टि नेत्रों को समष्टि नेत्र रूप परमेश्वर में अभेद करो ॥२९२॥ 
"खुदा नजर दे, तो सब सूरत खुदा की है ।"
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*जहाँ राम तहँ मन गया, मन तहँ नैना जाइ ।*
*जहँ नैना तहँ आतमा, दादू सहजि समाइ ॥२९३॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! शुद्ध अन्तःकरण में जहाँ राम है, वहाँ ही मन राम रूप हो गया और वहीं नेत्रादि सम्पूर्र्ण इन्द्रियाँ परमात्मा परायण बन गई हैं और वहीं आत्मा कहिए, चिदाभास युक्त बुद्धि अपने अधिष्ठान चैतन्य में समा रही है ॥२९३॥ 
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*जीवन मुक्ति, विषय वासना निवृत्ति*
*प्राणन खेलै प्राण सौं, मनन खेलै मन ।*
*शब्दन खेलै शब्द सौं, दादू राम रतन ॥२९४॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! व्यष्टि प्राण, समष्टि प्राण रूप परमेश्वर से खेले तो मुक्त है और नहीं तो अमुक्त है । ऐसे ही समष्टि रूप मन में व्यष्टि रूप मन खेले तो मुक्त है, नहीं तो अमुक्त है । समष्टि रूप शब्द ब्रह्म से व्यष्टि शब्द विचार द्वारा खेले तो मुक्त है, नहीं तो अमुक्त है । इस प्रकार वह राम रूपी रत्न ब्रह्म चैतन्य, हृदय - प्रदेश में स्थित है । उससे अभेद होइये ॥२९४॥
(क्रमशः)

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