मंगलवार, 25 दिसंबर 2012

= परिचय का अंग =(४/२९५-६)


॥दादूराम सत्यराम॥
*"श्री दादूदयाल वाणी(आत्म-दर्शन)"* 
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी 
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज 
*= परिचय का अंग - ४ =*
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*चित्तन खेलै चित्त सौं, बैनन खेलै बैन ।*
*नैनन खेलै नैन सौं, दादू प्रकट ऐन ॥२९५॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! समष्टि चित्त से व्यष्टि चित्त खेले तब मुक्त है, फिर इसका बाहरी चिंतन खत्म हो जाता है । समष्टि वचन रूपी परमेश्वर से व्यष्टि वचन खेले तो बाहरी वक्त्रुत्व शक्ति खत्म हो जाती है और समष्टि नेत्ररूप परमेश्वर से जब व्यष्टि नेत्र विचार द्वारा खेले, तो फिर बहिरंग जगदाकार खेल की दृष्टि समाप्त हो जाती है अर्थात् अैन कहिए, जब स्वस्वरूप का परिचय हो जाता है, तो सभी बाहर के व्यापार रुक जाते हैं ॥२९५॥ 
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*पाकन खेलै पाक सौं, सारन खेलै सार ।*
*खूबन खेलै खूब सौं, दादू अंग अपार ॥२९६॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! व्यष्टि पवित्र स्वरूप समष्टि पवित्र से खेले, तो फिर दुनियावी पवित्रता से अन्तर्मुख हो जाता है । व्यष्टि सार स्वरूप, समष्टि सार से खेले कहिए, अभेद होवे तो मुक्त है । व्यष्टि सुन्दरता, समष्टि सुन्दरता खूब से खेले कहिए अभेद होवे अर्थात् दृश्य अंग से आगे जो अपना अपार व्यापक चैतन्य है, जब उसको जान लिया तब और सब वासनाएँ नष्ट हो जाती हैं ॥२९६॥
(क्रमशः)

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