बुधवार, 26 दिसंबर 2012

= परिचय का अंग =(४/२९७-९)

॥दादूराम सत्यराम॥
*"श्री दादूदयाल वाणी(आत्म-दर्शन)"* 
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी 
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज 
*= परिचय का अंग - ४ =*
.
*नूर न खेलै नूर सौं, तेज न खेलै तेज ।*
*ज्योतिन खेलै ज्योति सौं, दादू एकै सेज ॥२९७॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! व्यष्टि नूर रूप जीव, समष्टि चैतन्यरूप नूर से विचार द्वारा खेले तो मुक्त है, नहीं तो अमुक्त है । व्यष्टि तेज, समष्टि तेज से अभेदरूपी खेल खेले, तो मुक्त है । व्यष्टि ज्योति, समष्टि ज्योति से एकतारूप खेल खेले, इस प्रकार एक अन्तःकरणरूपी सेज पर अभेदतारूप आनन्द को अनुभव करता है ॥२९७॥ 
.
*पंच पदारथ मन रतन, पवना माणिक होइ ।*
*आतम हीरा सुरति सौं, मनसा मोती पोइ ॥२९८॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! अब सूक्ष्म माला का स्वरूप बताते हैं कि यह पंच ज्ञान इन्द्रियाँ तो मानो पांच प्रकार के नग हैं और पवित्र मन है, वह रत्न है । पांच प्राण माणिकरूप हैं, आतम कहिए साभास बुद्धि हीरा है और शुद्ध मनसारूप मोती है । सुरतिरूपी सुई द्वारा विचार रूपी धागे में यह माला पिरोइये ॥२९८॥ 
"भूमिरापोSनलो वायुः सं मनो बुद्धिरेव च ।
अहंकार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा ॥" 
.
*अजब अनूपम हार है, सांई सरीषा सोइ ।*
*दादू आतम राम गल, जहाँ न देखे कोइ ॥२९९॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! पूर्वोक्त प्रकार से आश्चर्यरूप, उपमा रहित जो "सांई" कहिए, परमेश्वर है, उसके लायक यह हार है । उसको अपने हृदय स्थान में, जहाँ दूसरा पामर - विषयी मानव कोई भी नहीं देख सकता है, वहाँ परमेश्वर के गले में यह हार पहनाइये तो इस जीवात्मा का जीवन धन्य है ॥२९९॥ 
*एक पुष्प कोउ पुरुष ले, हरि समर्प्यो आइ ।* 
*ता पुण्य के प्रभाव से, इन्द्र हुओ पुनि जाइ ॥* 
दृष्टान्त - एक पुरुष एक रोज बगीचे में घूमने गया । वहाँ चम्पा का महकदार पुष्प खिल रहा था । उसने तोड़ा और विचार किया कि यह पुष्प मेरी मित्र जो वेश्या है, उसको दूँगा तो वह मुझ पर बहुत प्रसन्न होगी । वह पुष्प लेकर अपनी मित्र के यहाँ गया । वह नहीं मिली । फिर विचार करने लगा, अब यह पुष्प तो मुरझा जाएगा । रास्ते में एक पंडित कथा बाँच रहा था । उसने सोचा, यह पुष्प कथा पर चढ़ा दें । फिर विचार किया कि कथा में यह न सुनाई पड़ जाये कि वेश्या के यहाँ जाना पाप होता है, पुष्प हाथ में लेकर दौड़ता हुआ फेंका तो पुष्प पुस्तक के ऊपर जाकर पड़ा । पंडित और लोग - बाग हँसने लगे । उन्होंने विचार किया कि वह पुष्प चढ़ाने का ही प्रेमी था, कथा सुनने का प्रेमी नहीं था । जब उसका अन्त समय आया तो यमदूत प्रकट हो गए । उसके लिंग शरीर को पकड़ कर यमराज के सामने ले जाकर खड़ा कर दिया । यमराज ने अपने कारिन्दा को हुक्म दिया कि इसके पाप - पुण्य देखो । कारिन्दा बोला - इसके पाप ही पाप हैं, एक पुष्प यह वेश्या के लिए लाया था, जब वह नहीं मिली तो उस पुष्प को भगवान् की कथा हो रही थी, उस जगह दौड़ते हुए फेंका, तो पुस्तक के ऊपर जा पड़ा । बस, इससे ऊपर इसका कोई अच्छा कर्म नहीं है । यमराज बोले - भगवान् की कथा पर पुष्प गिरा है इसलिए पुण्य तो जरूर हुआ है, उस पुण्य का फल दो घड़ी का सुख है । बाकी तो सब पाप का फल दुःख ही दुःख है । पहले तू कौन सा भोगेगा ? उसने विचार किया पहले सुख भोग लूं और इस यमराज को भी समझ लूं । बोला - मैं पहले सुख भोगूंगा । यमराज ने कामधेनु को बुलाया । और कहा - दो घड़ी के लिए जो यह कहे, वह काम आप करो । कामधेनु बोली - बोल भाई ! क्या चाहता है ? वह बोला - इस यमराज की गुदा में सींग देकर दो घड़ी तक इसे उठा ले । कामधेनु ज्यों ही यमराज की तरफ चली, तो यमराज आसन छोड़कर भगवान् विष्णु की तरफ दौड़ पड़े । पीछे - पीछे कामधेनु चली जा रही है । उसके पीछे - पीछे पापी चला जा रहा है और बोला - यह मैं आँख से देखूँगा । भगवान् के दरबार में तीनों जा पहुँचे । यमराज बोला - महाराज ! रक्षा करो । भगवान् बोले - जो दो घड़ी का यमराज को दुःख होता, वह इस दौड़ धूप के कष्ट से बराबर हो गया । इस पापी को ले जाओ और यमलोक की त्रास देओ । पापी बोला - महाराज ! यहाँ भी अन्याय होने लगा । भगवान् बोले - कैसे ? पापी बोला - "महाराज, जो मांगा, वह भी नहीं दिया और अब यमराज की त्रास का हुक्म दे दिया । यह अन्याय ही है । एक मेरी विनती तो आप स्वीकार करो ।" भगवान् - क्या ? पापी - "एक कागज के टुकड़े में यह लिख दो कि जो भगवान् का दर्शन करेगा, वह आज से नरक में जाकर त्रास भोगेगा ।" भगवान् - "यह तो हम नहीं लिखते ।" पापी - "क्यों महाराज ?" भगवान् - "हमारे दर्शन करने वाला किस तरह नरक में जा सकता है ?" पापी - "महाराज ! मुझे नरक में भेज रहे हो । मैं आपके दर्शन करके अब नरक में जा रहा हूँ ।" भगवान् यमराज से बोले - इसके तो सब पाप नष्ट हो गए, यह तो अब स्वर्ग में जाएगा और फिर दूसरे कल्प में इन्द्र बनेगा । वह भगवान् के एक पुष्प अर्पण करने से ही इस पद को प्राप्त हो गया ।
उपरोक्त हार जब राम को पहना दिया जाता है, तो वह जीवात्मा तो मुक्त ही हो जाता है ।
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें