बुधवार, 26 दिसंबर 2012

= परिचय का अंग =(४/३००-२)


॥दादूराम सत्यराम॥
*"श्री दादूदयाल वाणी(आत्म-दर्शन)"* 
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी 
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज 
*= परिचय का अंग - ४ =*
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*दादू पंचों संगी संग ले, आये आकासा ।*
*आसन अमर अलेख का, निर्गुण नित वासा ॥३००॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! यह जीवात्मा पंच ज्ञान इन्द्रियों सहित अमर अलेख के आसनरूप आकाश कहिए, हृदय स्थान में एकाग्र होकर निर्गुण ब्रह्म में नित्य निवास करता है ॥३००॥ 
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*प्राण पवन मन मगन ह्वै, संगी सदा निवासा ।*
*परचा परम दयालु सौं, सहजैं सुख दासा ॥३०१॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! इस प्रकार से प्राण, सुरति और मन ब्रह्म में मग्न होकर संगी कहिए, परमेश्वर के साथ सदा निवास कहिए, ब्रह्म स्वरूप हो गए हैं और परमदयालु, परमेश्वर का साक्षात्कार होने से अनायास ही भक्तों को ब्रह्मानन्द की प्राप्ति हो गई है ॥३०१॥ 
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*दादू प्राण पवन मन मणि बसै, त्रिकुटि केरे संधि ।*
*पाँचों इन्द्री पीव सौं, ले चरणों में बंधि ॥३०२॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! ध्यानावस्था में जो त्रिकुटी दर्शन होता है, उसके संधि कहिए, तीर पर प्राण पवन और मनरूपी मणि बसते हैं । इसलिये हे संतोँ ! वहाँ अपनी ज्ञान इन्द्रियों को परमेश्वर के चरणों में अर्पण करके ब्रह्म में अभेद हो जाओ ॥३०२॥
(क्रमशः)

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