गुरुवार, 27 दिसंबर 2012

= परिचय का अंग =(४/३०३-५)

॥दादूराम सत्यराम॥
*"श्री दादूदयाल वाणी(आत्म-दर्शन)"* 
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी 
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज 
*= परिचय का अंग - ४ =*
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*प्राण हमारा पीव सौं, यों लागा सहिये ।*
*पुहुप वास घृत दूध में, अब कासौं कहिये ॥३०३॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! श्री दयाल महाराज अपने को ही उपलक्षण करके, जिज्ञासुजनों के प्रति उपदेश करते हैं कि जैसे पुष्प में गंध और दूध में घृत एक रूप है, वैसे ही हमारा जीवात्मा एकाग्र होकर के अगर परमात्मा में निश्चल होवे तो पुनः यह बात किसको बतावें ? क्योंकि यह अवाच्य है ॥३०३॥ 
ईख मांझ गुड़ तेल तिलन में, पय मधि घी शुचि दार । 
यों आतम परमातमां, दीसै जुगति विचार ॥ 
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*पाहण लोह बिच वासदेव, ऐसे मिल रहिये ।*
*दादू दीन दयाल सौं, संग हि सुख लहिये ॥३०४॥* 
टीका - हे संतों ! जैसे पत्थर और लोहे में अग्नि अभेद होती है, इसी प्रकार दीन - दयाल परमेश्वर में अभेद होकर साथ में ही सुख प्राप्त करो ॥३०४॥ 
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*दादू ऐसा बड़ा अगाध है, सूक्षम जैसा अंग ।*
*पुहुप वास तैं पतला, सो सदा हमारे संग ॥३०५॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! परमेश्वर का व्यापक स्वरूप देखिये, सो वह अगाध है । अनन्त कोटि ब्रह्माण्ड उसमें समा रहे हैं और सूक्ष्म स्वरूप से देखें तो हे प्यारे ! जैसे पुष्प में सुगन्ध सूक्ष्म है, उससे भी अति बारीक होकर प्रभु अपने भक्तों के संग और नानारूप में रम रहे हैं ॥३०५॥ 
श्लोक - 
"अणोरणीयान महतो महीयान, 
आत्माSस्य जन्तोर्निहितं गुहायाम् । 
तमक्रतुं पश्यति वीतशोको, 
धातुः प्रसादात् महिमानमीशम् ॥"
"वेदान्ते सारसर्वस्वं, ज्ञानविज्ञानमेव च । 
अहमात्मा निराकारः, सर्वंव्यापी स्वभावतः" ॥ 
वेदान्तों का सार सर्वस्व यही है और यही ज्ञान विज्ञान है कि स्वभाव से सब में वर्तनेवाला वह अति सूक्ष्म और निराकार जो आत्मा है, वह मैं ही हूँ ।
ईख मांझ गुड़ तेल तिलन में, पय मधि घी शुचि दार ।
यों आतम परमातमां, दीसै जुगति विचार ॥ 
(क्रमशः)

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