॥दादूराम सत्यराम॥
*"श्री दादूदयाल वाणी(आत्म-दर्शन)"*
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज
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*= परिचय का अंग - ४ =*
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*दादू जब दिल मिली दयालु सौं, तब अंतर कुछ नांहि ।*
*ज्यों पाला पाणी कों मिल्या, त्यों हरिजन हरि मांहि ॥३०६॥*
टीका - हे जिज्ञासुओं ! जैसे पाला पिघल कर अपने कारण रूप पानी में मिलता है, तो फिर परस्पर में कुछ भी भिन्न - भाव नहीं रहता है । इसी प्रकार हरि के जन संतपुरुष जब प्रभु में अभेद हुए, तो अविद्या आदिक अन्तराय फिर नहीं रहते हैं ॥३०६॥
जल तरंग एको भई, पाला गलि जल मांहि ।
जीव ब्रह्म यों ही मिल्या, और प्रयोजन काहि ॥
जाका जतन करत जिसवासर, सो तो पाया ठांव ।
जतनी जतन एक ह्वै मिलिया, ये ही प्रयोजन नांव ॥
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*दादू जब दिल मिली दयालु सौं, तब सब पड़दा दूर ।*
*अैसैं मिल एकै भया, बहु दीपक पावक पूर ॥३०७॥*
टीका - हे जिज्ञासुओं ! जैसे बहुत से दीपकों को प्रज्वलित करके अग्नि में मिला देवें, तो वे तद्रूप हो जाते हैं । इसी तरह आत्म अभ्यास द्वारा अविद्यादिक पड़दा दूर करके संतजन ब्रह्मरूप हो जाते हैं ॥३०७॥
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*दादू जब दिल मिली दयालु सौं, तब अंतर नांही रेख ।*
*नाना विधि बहु भूषणां, कनक कसौटी एक ॥३०८॥*
टीका - हे जिज्ञासुओं ! जैसे स्वर्ण के नाना आभूषणों को अग्नि कसौटी देवे, तो केवल स्वर्ण शेष रहता है, उसी प्रकार संसार में जीवों के जो नानात्वरूप हैं, सो भी स्वर्ण के आभूषणों की भाँति संसार - दृष्टि से भिन्न - भिन्न प्रतीत होते हैं, किन्तु सत्य कसौटी ब्रह्मज्ञान होने पर उनमें किंचित् भी द्वैतभाव नहीं रहता है ॥३०८॥
(क्रमशः)

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