शुक्रवार, 28 दिसंबर 2012

= परिचय का अंग =(४/३०९-११)


॥दादूराम सत्यराम॥
*"श्री दादूदयाल वाणी(आत्म-दर्शन)"* 
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी 
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज 
*= परिचय का अंग - ४ =*
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*दादू जब दिल मिली दयालु सौं, तब पलक न पड़दा कोइ ।*
*डाल मूल फल बीज में, सब मिल एकै होइ ॥३०९॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! जैसे वृक्ष के डाल, मूल, फल, फूल सब मिल करके बीज में एक रूप होते हैं । वैसे ही यह जीवात्मा परमानन्द में अभेद हुआ, तो फिर एक पलक का भी पड़दा अन्तराय सम्भव नहीं है अर्थात् पूर्ण अभेद एक रूप होता है ॥३०९॥ 
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*फल पाका बेली तजी, छिटकाया मुख मांहि ।*
*सांई अपना कर लिया, सो फिर ऊगै नांहि ॥३१०॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! जैसे परिपक्व फल बेली को तज देता है और उस फल को खा लिया जाय या भून लिया जाय, तो फल के बीज को कहीं भी उपजाइये, वह नहीं उपजेगा । वैसे ही हरि के भजन और ज्ञान से जीवरूपी फल, पापों की निवृत्ति रूपी परिपक्व अवस्था को प्राप्त होकर शरीर रूपी बेली में अहं भावना अर्थात् विपरीत भावना से रहित अपने स्वरूप को निश्चय कर ले, तो फिर वह जीव जन्म - मरण रूपी संसार को नहीं प्राप्त होता है ॥३१०॥ 
"यथा हि भर्जितब्रीहि, बीजं नोत्पद्यते कदा ।"
जरगी जिनकी वासना, ब्रह्म अगनि के मांहि । 
"तुलसी" भूंदे अन्न ज्यों, सो फिर ऊगै नांहि ॥ 
"कबीर" सींध जल गई, आग लगी वन मांहि । 
बीज बेलि दोऊ जरी भी ऊगण की नांहि ॥ 
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*दादू काया कटोरा दूध मन, प्रेम प्रीति सों पाइ ।*
*हरि साहिब इहि विधि अंचवै, वेगा वार न लाइ ॥३११॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! इस काया रूपी कटोरे में शुद्ध मन रूप दूध है और इसमें निर्वासनिक प्रेम रूपी मिश्री मिलाओ । इस प्रकार अखण्ड प्रीति से फिर यह दूध परमेश्वर के अर्पण करो, तो परमेश्वर इस दूध को अवश्य पान करेंगे । इसमें किंचित् भी देर न लगाओ । इस मन को हरि रूप साहिब के समर्पित कर दो ॥३११॥ 
(क्रमशः)

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