शुक्रवार, 28 दिसंबर 2012

= परिचय का अंग =(४/३१२-४)

॥दादूराम सत्यराम॥
*"श्री दादूदयाल वाणी(आत्म-दर्शन)"* 
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी 
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज 
*= परिचय का अंग - ४ =*
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*टगा टगी जीवन मरण, ब्रह्म बराबरि होइ ।*
*परगट खेलै पीव सौं, दादू बिरला कोइ ॥३१२॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! जीवन से मरण पर्यन्त "टगाटगी" अखण्ड ब्रह्म सुरति द्वारा ब्रह्मस्वरूप होकर आत्मा का साक्षात्कार करते हैं, उन्हें धन्य है । किन्तु ऐसे मुक्त पुरुष कोई बिरले ही होते हैं ॥३१२॥ 
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*दादू निबरा ना रहै, ब्रह्म सरीखा होइ ।*
*लै समाधि रस पीजिये, दादू जब लग दोइ ॥३१३॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! जब तक प्राण - पिण्ड का सम्बन्ध बना हुआ है, तब तक नाम का स्मरण करता रहे । परमात्मा की भक्ति में कभी भी शिथिलता नहीं करना और लै कहिए नाम में तदाकार वृत्ति करके निदिध्यासन की परिपक्व अवस्था में स्थिर होकर ब्रह्मानन्द का पान करके ब्रह्मरूप होइये । जब तक सेवक के मन में सेव्यभाव विद्यमान है, तब तक भजन की पूर्णता नहीं है । पूर्ण ब्रह्मरूप होने तक क्षण भर भी चैन नहीं लीजिए ॥३१३॥ 
*न्यारे ने हीरा लह्यो, तो पर हेरत ठौर ।* 
*बहुरि बूझी बादशाह, अब क्यों ढूँढत और ॥* 
दृष्टान्त - एक न्यारा बैठा - बैठा मिट्टी छान रहा था । उसको एक हीरा मिल गया । बादशाह ने दूर से देखा और जान गया कि इसे अमोलक हीरा मिला है । बादशाह बोले - अब क्यों मिट्टी छानता है ? रत्न तो पा लिया तैंने । न्यारा बोला - "ढूंढता था, तभी तो पाया", अब ढूंढना कैसे छोड़ दूं ? दार्ष्टान्त में न्यारे के स्थान में जिज्ञासु है । आत्मा अनात्मा का विचार करना ही छानना है और परमात्मारूपी रत्न ही प्राप्त कर लेना है ।
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*बेखुद खबर होशियार बाशद, खुद खबर पैमाल ।*
*बेकीमत मस्तान गलतान, नूर प्याले ख्याल ॥३१४॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! जो पुरुष "बाशद" = रात दिन, बेखुद = अकह, ब्रह्म वस्तु की खबर, जानकारी में तो होशियार तत्पर हैं, और जिनकी खुद की खबर, नाम, जगत और शरीर आदि का अध्यास, पैमाल = नष्ट हो गया है, वे मुक्तजन बे कीमत ब्रह्म में मस्त होकर गलतान = तद्रूप हो रहे हैं । ऐसे मुक्तपुरुषों को एक नूर स्वरूपी प्याले का भी ख्याल है ॥३१४॥ 
या साखी सुन औलिया, चल आयो आमेर । कथा करत गुरुदेव को, मुँह चालत लियो फेर ॥ 
दृष्टान्त - ब्रह्मऋषि दादू दयाल जी महाराज आमेर में विराजते थे । राजा मानसिंह के सहित सभी लोग गुरुदेव का प्रवचन सुना करते थे । एक रोज एक मुसलमान फकीर ने उपरोक्त साखी गुरुदेव की याद कर रखी थी, और विचार किया कि जिनको अपने आप की खबर नहीं है अर्थात अपने आपको भूले बैठे हैं, उनके दर्शन करना चाहिए, इस भावना को लेकर आया । 
जब दूर से गुरुदेव को प्रवचन करते देखा, तब विचार किया कि इनको तो सब खबर है । साखी में तो इन्होंने यह कहा है कि "खुद खबर पैमाल" कि हमने अपने आपको मिटा दिया है परन्तु यहाँ तो मैंने विपरीत रूप देखा । चलूं, यह विचार करके वापिस लौट चला । गुरुदेव उसके मन की बात जान गए और बुलाया "सांई, यहाँ आओ ? आप कैसे आये थे ? और कैसे लौट चले ?" पूर्वोक्त वृत्तान्त अपने मन का सतगुरु को कह सुनाया । 
सतगुरु महाराज ने इस साखी से ३१८ वीं साखी तक सांई को उपदेश किया । यह सुनकर सांई ने सतगुरुदेव को नतमस्तक प्रणाम किया और निश्चय किया कि सच्चे परमात्मा के आशिक अपने आप को मिटा देते हैं । जिन्होंने अपने अहंकार को मिटा दिया है और जो उनसे परमात्मा का मार्ग पूछने जिज्ञासुजन आते हैं, उनको दक्षता से मार्ग का उपदेश करते हैं, ऐसे महापुरुषों को धन्य है, धन्य है ।
(क्रमशः)

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