॥दादूराम सत्यराम॥
*"श्री दादूदयाल वाणी(आत्म-दर्शन)"*
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज
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*= परिचय का अंग - ४ =*
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*दादू माता प्रेम का, रस में रह्या समाइ ।*
*अन्त न आवै जब लगै, तब लग पीवत जाइ ॥३१५॥*
टीका - हे जिज्ञासुओं ! जो संतजन प्रेम का माता है, सो प्रेम रस में ही अभेद रहता है और अपने पंच भौतिक शरीर के अन्त तक परमेश्वर के प्रेम - रस को ही पीते हैं अथवा जब तक ब्रह्मवेत्ता पूर्ण ब्रह्मरूप नहीं होते, तब तक ब्रह्म विचार में ही मग्न रहते हैं ॥३१५॥
"कबीर" हरिरस अघट है, पीवत खरा मिठास ।
रसिया ताका अमिट है, अचवत अधिक पियास ॥
भांवता भावै सदा, कबहूँ भूख न जाइ ।
घृत होमें वासदेव, कबहूँ नाहीं अधाइ ॥
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*पीया तेता सुख भया, बाकी बहु वैराग ।*
*ऐसे जन थाके नहीं, दादू उनमनि लाग ॥३१६॥*
टीका - हे जिज्ञासुओं ! जितना राम रस पीया, उतना पूर्ण सुख प्राप्त हुआ है । क्योंकि अति अनुराग सहित राम रस पीते हैं और बाकी के मायाकृत पदार्था से वैराग्य बहुत है । ऐसे मुक्तजन अतृप्त भाव से, ब्रह्म स्वरूप विचार में मग्न होकर, "उनमनि" कहिए शून्य ब्रह्मभाव को प्राप्त होते हैं ॥३१६॥
दई सो देता ना थके, लेता थके न दास ।
जन रज्जब दोऊ अथक, जुग जुग बढे पियास ॥
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*निकट निरंजन लाग रहु, जब लग अलख अभेव ।*
*दादू पीवै राम रस, निहकामी निज सेव ॥३१७॥*
टीका - हे जिज्ञासुओं ! निरंजन देव परमात्मा के समीप लगे रहो । अन्तःकरण की वृत्ति को स्वरूप - चिंतन में लीन करिये । जब तक अलख, अभेव स्वरूप में मिलकर ब्रह्मरूप नहीं हो जाते, तब तक निष्काम भाव से विचार रूप परमात्मा की सेवा करो और निरंतर राम - रस पान करते रहो ॥३१७॥
(क्रमशः)

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