॥दादूराम सत्यराम॥
*"श्री दादूदयाल वाणी(आत्म-दर्शन)"*
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज
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*= परिचय का अंग - ४ =*
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*राम रटणि छाड़ै नहीं, हरि लै लागा जाइ ।*
*बीचैं ही अटकै नहीं, कला कोटि दिखलाइ ॥३१८॥*
टीका - हे जिज्ञासुओं ! साधन कोटि में अपनी सुरति द्वारा अखण्ड राम की लय लगाओ और माया अपनी कोटि कला, अनन्त रिद्धि - सिद्धि, इहलोक - परलोक की अनन्त सम्पदा प्रकट करके माया दिखलाती है, परन्तु उनमें परमेश्वर के भक्त आसक्त नहीं होते हैं । प्रभु के नाम - स्मरण में ही संलग्न रहते हैं ॥३१८॥
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*दादू हरि रस पीवतां, कबहुँ अरुचि न होइ ।*
*पीवत प्यासा नित नवा, पीवणहारा सोइ ॥३१९॥*
टीका - हे जिज्ञासुओं ! हरि - रस को भाव - भक्ति, ज्ञान - ध्यान आदि द्वारा पान करते हुए कहिए, धारण करते हुए कभी भी अरुचि नहीं होती है । और हरि - रस को पीते हुए भी जिन्हें नित नई प्यास और जागती है, सो ही सच्चे संत पीनेवाले हैं ॥३१९॥
वरुण मित्र कियो जाट को, आना मेरे गेह ।
गयो तिसायो पीगयो, अमृत कर अति नेह ॥
दृष्टान्त - वरुण देवता एक समय मारवाड़ में चले गए । प्यास से दुखी होकर एक जाट की झोंपड़ी में पहुँचे । जाट ने एक मतीरा निकाला और वरुण देवता को खिलाया - पिलाया, उनकी भूख - प्यास दोनों मिट गई । वरुण देवता बोले - "तूने हमें अमृत जैसा रस पिलाया है, तूँ हमारा मित्र है । दुःख पड़े, तब मेरे पास आना । समुद्र तट पर जाकर आवाज देना कि मैं तेरा मित्र आ गया हूँ, वरुण देवता ! फिर मैं भी तुझे अमृत पिलाऊंगा और तेरा दुःख दूर करूँगा ।"
एक समय काल पड़ने पर जाट समुद्र पर गया । पूर्वोक्त प्रकार सब समाचार सुनाये । वरुण देवता हाथ में अमृत का घड़ा लेकर प्रकट हो गए । जाट बोला - प्यास लगी है । तब वरुण देवता अमृत पिलाने लगे । जाट पीता - पीता तृप्त नहीं हुआ । वरुण देवता बोला - "अरे धापा कि नहीं ?" तब जाट बोला - "आज तक कोई अमृत से भी धापा है क्या ?" यह कहकर जाट बोला - "बस रहने दे" । वरुण देवता ने जाट को बहुत से रत्न दिए और विदा किया ।
इसी प्रकार भगवान् के भक्त, भक्ति रूपी अमृत से कभी तृप्त नहीं होते हैं ।
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*दादू जैसे श्रवणा दोइ हैं, ऐसे होंहि अपार ।*
*राम कथा रस पीजिये, दादू बारंबार ॥३२०॥*
टीका - हे जिज्ञासुओं ! जैसे यह दो श्रोत्र इन्द्रियां हैं, ऐसे रोम - रोम में अपार होवें, तो बारम्बार मनुष्य जन्म धारण करके राम - रस रूप कथा अमृत को पीते ही रहें ॥३२०॥
सुनत अरुचि नहिं हरि कथा, अचवत रस न अघात ।
जगन्नाथ सत्संग से, कबहुँ न मन अलसात ॥
(क्रमशः)

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