॥ दादूराम-सत्यराम ॥
"श्री दादूदयाल वाणी(आत्म-दर्शन)"
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज
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*= परिचय का अंग - ४ =*
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*परिचय जिज्ञासु उपदेश*
*दादू मुझ ही मांही मैं रहूँ, मैं मेरा घरबार ।*
*मुझ ही मांही मैं बसूँ, आप कहै करतार ॥२१०॥*
*दादू मैं ही मेरा अर्श में, मैं ही मेरा स्थान ।*
*मैं ही मेरी ठौर में, आप कहै रहमान ॥२११॥*
टीका - परमेश्वर कहते हैं कि "मुझ ही मांही मैं रहूँ" अर्थात् मेरी महिमा में मैं अपने आप स्थित हूँ अथवा मेरे भक्त जो मुझ में स्थित हैं, मैं उनमें स्थित हूँ और जिन भक्तों का घरबार मैं हूँ, वे मेरे भक्त मेरा घरबार हैं । जो मुझ में स्थित हैं, उन मेरे भक्तों में मैं रहता हूँ । ब्रह्मऋषि दादू दयाल जी महाराज कहते हैं कि परमेश्वर इस प्रकार अपने भक्तों को उपदेश करते हैं । परमेश्वर कहते हैं कि मेरे भक्तों के हृदयरूपी आकाश में मैं ही हूँ और वे मेरे भक्त मेरे हृदयरूपी आकाश में स्थित हैं और जिन भक्तों ने मुझ में अपना स्थान जाना है, वे भक्त मेरा स्थान हैं । जिन्होंने मुझे अपनी ठौर जाना है, वे भक्त मेरी ठौर हैं । हे जिज्ञासुओं ! इस प्रकार रहमान परमेश्वर अपना परिचय सिद्ध भक्तों को आप कहते हैं ॥२१०-२११॥
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*दादू मैं ही मेरे आसरे, मैं मेरे आधार ।*
*मेरे तकिये मैं रहूँ, कहै सिरजनहार ॥२१२॥*
टीका - परमेश्वर कहते हैं, जो मेरे भक्त मेरे आसरे हैं, मैं उनके आसरे हूँ । जिन भक्तों का मैं आधार हूँ, वे भक्त मेरा आधार हैं । जिन भक्तों ने मुझे अपना तकिया कहिए, बगीचा, स्थान समझा है, उन भक्तों के हृदयरूपी तकिया में मैं स्थित हूँ । ब्रह्मऋषि कहते हैं कि इस प्रकार अपने भक्तों को भगवान् उपदेश करते हैं ॥२१२॥
(क्रमशः)

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