॥ दादूराम-सत्यराम ॥
*"श्री दादूदयाल वाणी(आत्म-दर्शन)"*
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज
.
*= परिचय का अंग - ४ =*
.
*मीठे मांही राखिये, सो काहे न मीठा होइ ।*
*दादू मीठा हाथ ले, रस पीवै सब कोइ ॥१८७॥*
टीका - हे जिज्ञासुओं ! जैसे चीनी को जल में मिला देवें, तो जल भी मीठा हो जाता है और सब कोई पान करते हैं, इसी प्रकार सत्संग में चित्तवृत्ति एकाग्र करके जिज्ञासुजन ब्रह्मज्ञानी हो जाते हैं । आनन्द - स्वरूप में अन्तःकरण की वृत्ति की लय लगाकर सब ही संत आत्म - साक्षात्कार रूपी रस पीते हैं ॥१८७॥
.
*सत्संगति - कुसंगति*
*मीठे सौं मीठा भया, खारे सौं खारा ।*
*दादू ऐसा जीव है, यहु रंग हमारा ॥१८८॥*
टीका - हे जिज्ञासुओं ! मिश्री मिलाने से तो जल मीठा होता है और नमक मिलाने से खारा हो जाता है । यही हमारा "रंग" कहिए, हाल है । ऐसे ही जलरूप जीव, मिश्रीरूपी सत्संगति मिलने से ब्रह्मरूप हो जाता है और नमक रूप कुसंग से पामर या खारा हो जाता है । इसलिए सभी को मिश्रीरूप सत्संग करना चाहिए ॥१८८॥
"याति रम्यं अरम्यत्वं स्थिरं अस्थिरतामपि ।
यथा दृष्टं तथा मन्ये याति साधुः असाधुताम् ॥"
योगवासिष्ठ
सूत्र: ॐ दुस्संग: सर्वथैव त्याज्यः ।
(मनुष्य को कुसंग का सब प्रकार परित्याग करना चाहिए ।)
मूरख संग न कीजिये, लौहा जल न तिराइ ।
कदली सीप भुजंग मुख, एक बूंद तिहुँ भाइ ॥
(स्वाति बूँद कदली मैं कपूर, सीप में मोती और सर्पमुख में गिरकर विष बन जाती है ।)
"जगन्नाथ" ढ़िंग नीच के, दीरघ लघु हो जाइ ।
ज्यूं गयन्द तन तनिक सा, दर्पण में दरसाइ ॥
.
*साध महिमा महात्म्य*
*मीठै मीठे कर लिये, मीठा मांही बाहि ।*
*दादू मीठा ह्वै रह्या, मीठे मांहि समाहि ॥१८९॥*
टीका - हे जिज्ञासुओं ! सदुपदेश करने वाले सतगुरुओं ने सत्संग में संलग्न करके उत्तम जिज्ञासुओं को ब्रह्मस्वरूप बना दिये हैं और मुक्तजन "मीठे मांहि समाहि" कहिए, ब्रह्म में अभेद होकर ब्रह्मरूप हो रहे हैं ॥१८९॥
"मोहन" रोटी खांड की, मिश्री रस दीठा ।
ऐसा हरि का नाम है, सबही दिशि मीठा ॥
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें